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श्री शुक सम्प्रदाय • पंचम आचार्य
श्री स्वामी श्री ठाकुरदास जी महाराज
Shri Swami Thakur Das Ji Maharaj
धाम गमन: आश्विन कृ० द्वादशी, सं० १९३० वि० (स्थान- लुक्सर)
निवास / पावन स्थल: लुक्सर, सहारनपुर
पावन चरित्र एवं जीवन दर्शन
श्री ठाकुर दास जी महाराज
श्री ठाकुरदास जी का जन्म लुकसर में हुआ। उन्होंने लुकसर में एक मंदिर भी बनवाया और वहाँ निवास भी करते थे। वे एक उच्च कोटि के महात्मा थे। ज्ञान, ध्यान आदि में उनकी उच्चतम स्थिति थी। समस्त ऋद्धि-सिद्धि उनके यहाँ सेवा में तत्पर रहतीं। वे गुणों के भण्डार थे। कहते हैं महापुरुष में उनतीस लक्षण होते हैं, वे सब श्री ठाकुरदास जी में वर्तमान थे।
वे दिन-रात युगल विहारी के ध्यान में लीन रहते। जो साधु-संत, उनके गुरुभाई आदि स्थान पर आते तो बड़े उत्साह से सेवा करते। वे मानसी साधना में सिद्ध थे। वे हृदय में युगल की छवि का प्राकट्य होने पर छककर दर्शन का सुख लेते। उनकी वाणी बहुत ही कोमल और मधुरता से भरी होती। सब साधु समाज में उनकी प्रसिद्धि थी।
उनके सम्बन्ध में एक वृत्त प्रसिद्ध है। एक दिन उनके स्थान पर आये हुए किसी श्रद्धालु का सहसा देहान्त हो गया। पुलिस को सूचना लगी तो उन्होंने आश्रम के लोगों को परेशान करना शुरू कर दिया। जब श्री ठाकुरदासजी को यह बात पता चली तो वे अपनी खड़ाऊँ से मुर्दे को ठोकर मारते हुए बोले—“उठ यहाँ से। ऐसे क्यों पड़ा है साधुओं को परेशान करने के लिए?” मुर्दा खड़ाऊँ का स्पर्श पाकर तुरन्त प्राणयुक्त होकर उठ खड़ा हुआ। सब लोग आश्चर्य से देखते रह गये। तभी से वे एक सिद्ध संत के रूप में जाने जाने लगे।
भक्त-भगवान की लीलाओं का कहाँ पार है। श्री ठाकुरदास जी की समाधि भी लम्बे समय तक बनी रहती। वे प्रिया-प्रियतम की मानसी सेवा में दो-दो दिन तक आसन पर बैठे रह जाते, उन्हें बिल्कुल भी देहाभास नहीं रहता। प्रसाद पाते समय भी उनके और ठाकुर के बीच लीला चलती। प्रसाद पाते हुए वे कभी रूदन करते तो कभी प्रसन्न हो जाते।
उनके शिष्य श्री बलदेव दास जी उन्हीं के पास रहते। वे इस रहस्य को जानने की एक दिन जिद कर बैठे। तब श्री ठाकुरदासजी ने बताया कि मेरे साथ गोपालजी भी बैठकर भोजन करने लगते हैं तो मैं यह सोचकर रो देता हूँ कि गोपालजी मेरा जूठा पाते हैं। और प्रसन्न यह सोचकर हो जाता हूँ कि देखो, उनका मुझसे कितना प्रेम है। वे सदा मेरे साथ ही भोजन पाते हैं। इस प्रकार श्री ठाकुरदास जी को नित्य श्री गोपालजी के दर्शन होते थे।
उन्होंने प्रिय-प्रियतम का ध्यान करते हुए लुकसर में ही देह त्याग भगवद्धामगमन किया। उनके प्रसिद्ध शिष्य श्री बलदेवदासजी कुछ समय तक उनके स्थान के महन्त रहे, बाद में यह दायित्व उन्होंने अपने ही गुरुभाई श्री ध्यानदासजी को सौंप दिया।
