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कृपा पात्र • कृपा पात्र संत
रामसखी जी महाराज
Ramsakhi Ji Maharaj
पावन चरित्र एवं जीवन दर्शन
रसिकाचार्य श्री रामसखी जी महाराज
चीरेखान मोहल्ला दिल्ली में रहता एक कायस्थ परिवार जिसने महाप्रभु श्री श्यामचरणदास जी महाराज का शिष्यत्व ग्रहण कर रखा था। उसी कायस्थ परिवार में श्री रामसखी जी का जन्म हुआ। लेकिन ये जन्मना किंपुरुष (न स्त्री और न पुरुष) थे। शुरू में ४-५ साल तक तो यह बात किसी को पता नहीं चली लेकिन बाद में भेद खुल गया और भेद खुलना जरूरी था क्योंकि रामसखी जी अपने को छिपाए गुरुदेव से दूर कितने दिन रह सकते थे।
भेद खुलने पर दिल्ली का नादर समाज कोतवाल को घर लेकर आए और बालक को अपने साथ ले गये, उस समय की परम्परा के अनुसार किंपुरुष का लालन-पालन नादर समाज में ही होता था। इधर श्री रामसखी जी के पिता गुरुदेव आचार्य महाप्रभु के पास आए और प्रार्थना की—
दिल्ली हिंजरा भेद जु पायो। मिल कोतवाले वा अपनायो॥
वा पितु आ महाराज सुनायो। लिखि रुक्का अप ताहि भिजायो॥
बाँचत ही कोतवाल डराये। हिंजरा लड़का संग लिवाये॥
चरणदास के लाय हजूरी। कहि तकसीर करी हम पूरी॥
हम नहिं जाना तुम शिष साँई। अनजाने तकसीर कराई॥
महाराज सुनि धीरज दीनो। कहि तुम गुनह कछू नहिं कीनो॥
(लीलासागर, २८०)
आचार्यचरण ने बालक के पिता की प्रार्थना सुनकर कोतवाल को पत्र लिखा और उसे बालक को साथ लेकर अपने पास आने का संदेश दिया। कोतवाल डरता हुआ बालक को लेकर महाराज के सामने प्रस्तुत हुआ। उसने बार-बार क्षमा याचना की। श्री महाराज बोले—इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं लेकिन इस बालक से यह पूछ लिया जाये कि यह कहाँ रहना चाहता है? कोतवाल ने पूछा तो—
बोला बालक होय हुलासा। चरणदास चरणन हूँ पासा॥
बालक ने श्री महाराज के पास रहने की तुरन्त ही इच्छा व्यक्त कर दी। समर्थ सदगुरु की यही विलक्षणता होती है कि जीव उनके चरणों को छोड़कर अन्यत्र नहीं भटकना चाहता। श्री आचार्यचरण ने नादर समाज को पाँच रुपये तथा कोतवाल को प्रसाद देकर भेज दिया। बालक के पिता ने अत्यन्त प्रसन्न हो उसकी बाँह पकड़कर भक्तराज श्री महाराज के भेंट कर दिया।
अब बालक पूर्णरूपेण गुरु का ही हो गया तो वे ही स्नान-श्रृंगार करायेंगे—
यज्ञ करयो सब साधु जिमाये।
महाराज सह पट पहराये॥
कृतकृत्य आपन को जानी।
भए पारायण कुल अप जानी॥
तिलक जु कंठी माल, साधु भेष ताको दियो।
कीनों ताहि निहाल, रामसखी ता नाम धर॥
(लीलासागर, २८०)
श्री आचार्य चरण ने उन्हें स्नान करा खुद श्रृंगार धारण करवाया। तिलक लगाकर कंठी बाँधी और नामकरण किया—“रामसखी!” ‘रा’ माने श्री राधिका और ‘म’ माने श्री मनमोहन अर्थात् प्रिया प्रीतम की, युगल की सखी—
कर मेहंदी पग कंकन बाजे। अंग अंग भूषण छबि छाजे॥
सखी भेष अलंकार सु जेते। महाराज सज दीने तेते॥
क्योंकि निकुञ्ज की रसोपासना वालों का निज स्वरूप सखी का ही है। यही बात आचार्य महाप्रभु ने श्री गुरुछैना जी को भी प्रत्यक्ष दिखाई।
श्री आचार्य चरण ने रामसखी जी को अपने सेवकों की स्त्रियों को सत्संग कराने, नृत्य-कीर्तन कराने की सेवा सौंप दी साथ ही युगल की अंग माधुरी छवि में उन्हें उलझा दिया। वे रसिक मूर्ति हो गई। अपने परिकर को सत्संग, कीर्तन, नृत्यादि कराते हुए रामसखी जी भावमग्न रहने लगीं। प्रेम रंग में पूर्णतः रंग गईं। भावमय निकुंज लीला में एकदम तल्लीन रहने लगीं। गुरुदेव ने जिनमें इनका मन अटका दिया अब उसे बिसरना तो बहुत दूर, उसी में तदाकार होने की लहरें उठने लगीं।
कृष्ण रूप में ताहि पगायो। अंग माधुरी छवि उरझायो॥
लगा नेह पल बिसरत नाहीं। उठत उमंग हरि मिलने ताईं॥
(लीलासागर, २८१)
श्री रामसखी जी ने सत्संग में आने वाले परिकर से कह दिया कि इस महीने के अंत में मैं प्रिया-प्रीतम से मिलूंगी। महीना बीतने वाला था, शरद पूर्णिमा के तीन दिन शेष रहे थे। तब आप कुछ उदास रहने लगी जैसे शरीर में कोई रोग आ गया हो लेकिन यह शारीरिक पीड़ा नहीं थी। यह तो प्रेम ज्वर था जिसे जगत नहीं समझ सकता।
शरद पूर्णिमा का दिन आ गया। श्री रामसखी जी ने अपने परिकर से कहा—“आज तो मेरे पिया मिलन का दिन है।” उन्होंने दो स्त्रियों को आचार्य चरण के पास भेजा और प्रार्थना करवायी कि गुरुदेव! आप आकर मुझे विदा करें।
श्री महाराज रामसखी जी के स्थान पर पहुँचे। रामसखी जी ने दर्शन कर उनकी प्रदक्षिणा की। महाराज ने उन्हें हृदय से लगाया और मन की बात पूछी तब वे बोले—अब मुझसे प्रिया-प्रीतम के बिना रहा नहीं जा रहा है। आप कृपा कर मुझे आज्ञा करें—धाम गमन के लिये।
महाराज ता हिये लगायो। पूछी व्यथा सु मुख बतरायो॥
पिय प्यारी बिन रहा न जाई। आज्ञा दो गुरुदेव गुसाईं॥
(लीलासागर, २८१)
आचार्य चरण ने उन्हें बहुत समझाया लेकिन वे तो तीव्र विरह वेदना में व्याकुल हो गयीं। अब आचार्य महाप्रभु उन्हें आशीर्वाद देकर अपने स्थान पर लौट आये।
आधी रात के समय रामसखी जी ने सखी-श्रृंगार किया। परिकर की जो स्त्रियाँ वहाँ मौजूद थीं उनसे कहा जिसे जो माँगना हो, माँग लो। लेकिन स्त्रियाँ इस मर्म-प्रसंग को कहाँ पहचानने वाली थीं। उल्टे उन्हें वायु के प्रवाह में जान कमरे में बंद कर ताला लगा दिया।
किनहूँ मर्म जु नहिं पहिचानी। किये बावरे वायु सु जानी॥
पट दे साँकर ताला लाये। उठे तभी सब पकड़ घिराये॥
(लीलासागर, २८२)
श्री रामसखी जी नृत्य मग्न हो गईं। अचानक घुँघरुओं की ध्वनि के साथ जोर की चमचमाहट हुई। ताला और दरवाजा खुल गया तथा रामसखी जी अलोप हो गईं। वहाँ उपस्थित स्त्रियों ने तो केवल घुँघरुओं की झंकार सुनी और प्रकाश देखा। अब तो जाग हो गयी। गली-गली, घर-घर में, सब जगह श्री राम सखी जी को ढूँढा पर वे अब यहाँ कहाँ थीं? वे तो नित्य निकुंज में अपने स्वरूप से प्रवेश कर गईं। प्रातःकाल आचार्य महाप्रभु ने सबसे कहा कि रामसखी जी सदेह धाम गमन कर गई हैं।
सहित देह प्रभु पति मिली, रामसखी ही जानी।
जोगजीत सखसों कही, श्री महाराज बखानी।।
(लीलासागर, २८२)
ऐसा सुना है कि जितना विरह भक्त को होता है और भक्त भगवान के बिना नहीं रह पाता है वैसा ही विरह भगवान को भी भक्त से मिलने का होता है। लेकिन यह प्रत्यक्ष श्री रामसखी जी के चरित्र में ही देखा जा सकता है। पहली बात तो धाम गमन इतना सहज नहीं और फिर इसी भौतिक शरीर से, परन्तु श्री रामसखी जी को यह कृपा प्राप्त हुई। इस प्रकार वे आचार्य महाप्रभु के भूतल पर रहते हुए ही निकुंज लीला में प्रवेश कर गईं। उस समय उनकी अवस्था मात्र १६ वर्ष ही थी।
श्री रामसखी जी ने अपने मुख्य ग्रंथ—श्री भक्ति रस मंजरी में भक्ति के समस्त साधनों जैसे श्रीहरि-गुरु की विनय, व्रतोत्सव, अध्याय, विवाह, माधुरी उपासना, धाम की शोभा के संक्षेप में वर्णन के साथ ही श्री शुक सम्प्रदाय के सिद्धान्त का आद्योपान्त उपदेश भी किया है। इस प्रकार यह वाणी जी अपने आप में पूर्ण है, भक्ति रस से ओत-प्रोत है। इसके अलावा अध्यात्म और नृत्य राघव मिलन भी उनकी रचनाएँ हैं। श्री भक्ति रस मंजरी में वर्णित उनके पद और सिद्धान्त सम्बन्धी उपदेश श्री शुक सम्प्रदायानुगामी के लिए अवश्य ही शास्त्र हैं। यहाँ उनके कुछ पद और सम्प्रदाय सम्बन्धी सिद्धान्त का संक्षिप्त उल्लेख किया जा रहा है—
उनका विनय का यह पद दृष्टव्य है—
अहो नव लाल पिय, विनय सुन लीजिये।
वास वृन्दाविपिन, टहल श्री कुंज की,
सोहनी आदि मोहि, कृपा कर दीजिये।।
और कुछ न चहौं, मुक्ति बैकुण्ठ लौं,
रूप रस माधुरी पान करि जीजिये।
परी भव जलधि में, पार पावत नहीं,
धुनत सिर नाथ, बलि दया टुक कीजिये।।
‘रामसखी’ शरण पै, दृष्टि करुणा करो,
भई अति विकल, सब गयो बल छीजिये।।
इसी प्रकार श्री धाम वृन्दावन की रज रानी की महिमा भी उन्होंने गायी है—
श्री वृन्दावन की धूली, परम सुंगल मूली।
जेहि मुनिजन ध्यान लगावैं, ब्रह्मादिक छुवन न पावैं।
जो आलिन पद आराधैं, सो पावैं बिना उपाधौं।।
जो अपने शीश चढ़ावैं, अरु वृन्दावन जस गावैं।
जब कृपा करें श्री राधा, सब पूरे मन की साधा।।
उद्धव आदि सिर धारी, श्री शुक मुनि मुखहि उचारी।
जेहि आगम निगम पुकारैं, सब ऋषि सिद्धि तापैं वारैं।।
कहाँ लौं कहाँ बखानी, जाकि महिमा कोउ न जानी।
श्री रामसखी मन दीनों, निज अंग अंग भूषण कीनों।।
श्री रामसखी जी की वाणी में श्री शुक सम्प्रदाय के सिद्धान्तादि का कथन—
सम्प्रदाय शुकदेव मुनि, भक्ति अनन्य अकाम।
मत भागवत अपेल दृढ़, ताको कोटि प्रणाम।।
गुरुद्वारो चरणदासिस को, पीत वसन अभिराम।
तुलसी कंठ ग्रीवा जुगल, माल ललित छबि धाम।।
चिह्न चंद्रिका नाम प्रिया, श्री तिलक बीच भाल।
जपिये मुख निशिदिन सदा, श्री राधा वल्लभ लाल।।
राधा मोहन इष्ट निज, मिट न तिन सम और।
अवतारन अवतारी जो, सबहिन के सिरमौर।।
श्री रंगदेवी यूथेश्वरी, श्री शुक सख्य स्वरूप।
मोकौं तिनकी किंकरी, सुरति राखि निज रूप।।
धाम श्री वृन्दा विपिन है, ग्राम श्री नन्दग्राम।
पुर बरसानो जानिये, सब मन पूरण काम।।
श्री बरसाने जो बसत, तिन्हैं बंधु निज जान।
कुंवारी नात सौं नात निज, यथायोग्य सौं मान।।
बन गहवर सर प्रेमसर, घाट श्री युगल बिहार।
कुंज गली पथ जानिये, गिरि गोवर्धन चार।।
गिरि गोवर्धन देवता, जमुना नदी अनूप।
यमुना कुण्ड तीरथ महा, गौर श्याम रस रूप।।
सेवा कुंज सो कुंज निज, सम्पत्ति दम्पति सेव।
सुख तमुख उज्ज्वल सरस, अच्युत गोत्र अभेद।।
ऋषि नारद मुनि व्यास सुत, वेद श्री वंशी नाद।
याही बिच साखा रिचा, राग रागिनी स्वाद।।
ज्ञान परा विज्ञान सो, श्री भागवत पुरान।
मत जानो अविरुद्ध निज, प्रभु तजि भजौं न आन।।
भूमि जानि ब्रज भूमि निज, मंत्र श्री राधेश्याम।
यही गायत्री जानिये, यह सब पूरण काम।।
नाम राधिका श्याम भज, राधा वल्लभ गाय।।
