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श्री स्वामी श्री बलदेवदास जी महाराज
श्री शुक सम्प्रदाय • षष्ठ आचार्य

श्री स्वामी श्री बलदेवदास जी महाराज

Shri Swami Baldev Das Ji Maharaj

धाम गमन: आषाढ़ सुदी नवमी, सं० १९५८ वि० (स्थान- लुक्सर)
निवास / पावन स्थल: ब्रज प्रदेश

पावन चरित्र एवं जीवन दर्शन

श्री बलदेव दास जी महाराज जगत का नियम है पहले साधन, पीछे सिद्धि। पहले कुआँ खोदना फिर पानी पीना। पर परमार्थ जगत में कभी-कभी इसका उल्टा होता है। पहले सिद्धि होती है, पीछे साधना होती है। भगवान के नित्य सिद्ध या कृपा सिद्ध भक्तों… के जीवन में ऐसा ही होता है। उनके नित्य सिद्ध परिकरों को सिद्धि के लिए साधना नहीं करनी होती। सिद्धि तो उन्हें अनादि काल से ही प्राप्त रहती है। वे जगत में आविर्भूत होते हैं भगवद् इच्छा से जगत् के जीवों के लिए एक आदर्श उपस्थित करने। कृपा सिद्ध जीवों को भी सिद्धि प्राप्त करने के लिए साधना नहीं करनी होती। उन पर साधन के ही भगवत्कृपा बरस पड़ती है। सच तो यह है कि भगवत्कृपा साधन सापेक्ष है ही नहीं। भगवान स्वतंत्र है। जिस पर इच्छा होती है कृपा करते हैं। कभी-कभी ऐसे व्यक्ति पर भी अनायास कृपा कर देते हैं जिसने कोई साधन-भजन किया ही नहीं। पर जब उसके ऊपर कृपा हो जाती है तब वह साधन-भजन के सिवा कुछ करता ही नहीं। उस पर पहले कृपा होती है, पीछे उसका भजन होता है। श्री स्वामी बलदेवदास जी के जीवन में ऐसा ही हुआ। उन्हें बाल्यावस्था में ही पहले भगवत्कृपा हुई। फिर अबाध गति से बह चली उनके भजन-साधनमय जीवन की निर्मल धारा। ब्रज के किसी ब्राह्मण परिवार में जन्म लेकर वे आठ वर्ष की अवस्था में ही बड़े भाई की मृत्यु के पश्चात् घर से निकल पड़े और द्वारिका जाने वाले साधुओं की मण्डली के साथ हो लिये। द्वारिका में जब रणछोड़ जी के मंदिर में गये, रणछोड़जी का भोग लग रहा था। मन्दिर के दरवाजे पर परदा पड़ा हुआ था और पुजारी जगमोहन में इधर-उधर डोल रहा था। उस समय श्री बलदेव दासजी को एकाएक न जाने कैसा आवेश हुआ। वे पुजारी की पीठ मुड़ते ही परदा उठाकर मन्दिर के भीतर घुस गये। वहाँ उन्हें रणछोड़ जी के साक्षात् दर्शन हुए। उन्होंने देखा कि मूर्त रूप में तो वे सिंहासन पर विराजमान हैं और प्रत्यक्ष रूप में नीचे बैठे भोग आरोग रहे हैं। वे तन्मय हो उनका रूप निहारते रहे। थोड़ी देर में जब भोग आरोगने वाले स्वरूप अंतर्धान हो गये, वे भी चुपके से बाहर निकल आये। उन्हें न मन्दिर के भीतर जाते किसी ने देखा, न बाहर आते। इसलिए किसी के द्वारा रोक-टोक या डाँट-फटकार भी नहीं की गयी। जिसे रणछोड़ जी स्वयं भीतर बुलाकर दर्शन देना चाहें और जिसका मार्ग उनकी शक्ति योगमाया अपने आप प्रशस्त कर दें, उसे किसी के द्वारा रोका जाना संभव ही कब है? उसी दिन रात में रणछोड़ जी ने बलदेवदासजी को स्वप्न में आज्ञा की—“दिल्ली के निकट लुकसर ग्राम में ठाकुर दास मेरा परम भक्त रहता है, उससे जाकर दीक्षा लो और वह जिस रीति से उपदेश करे, उस रीति से भजन करो।” उधर श्री ठाकुरदासजी को भी उन्होंने इसी प्रकार आज्ञा देकर कहा—“मेरा भक्त बलदेव दास तुम्हारे पास आ रहा है। बालक जानकर उसकी उपेक्षा न करना, उसे दीक्षा देकर भजन की रीति बतला देना।” रणछोड़ जी ने जिसके लिए इतना किया उसका दिल्ली का मार्ग भी अपने आप प्रशस्त हो जाना था। द्वारिका जी में बालक बलदेवदास की भेंट हुई कुछ चरणदासी संतों से जो दिल्ली जा रहे थे। उन्होंने प्रेम से उसे श्री ठाकुरदासजी के पास ले चलने का आश्वासन दिया। वह उनके साथ वहाँ पहुँच गया। उसे देखते ही ठाकुरदासजी ने कहा—“आओ वत्स। मैं तुम्हारी प्रतीक्षा में था।” और उसे हृदय से लगा लिया। मंत्र-दीक्षा देकर भजन की रीति का उपदेश किया। बलदेवदासजी उनके पास रहकर उनकी और उनके ठाकुर श्री युगल बिहारी जी की तन-मन से सेवा करने लगे। उस अल्पावस्था में ही उन्होंने ठाकुर सेवा की सारी विधि सीख ली। युगल विहारी जी की रसोई भी वह स्वयं बनाने लगे। श्री ठाकुरदासजी तो सिद्ध संत थे ही। उनके द्वारा मुर्दे को जीवित कर देने की घटना तो प्रसिद्ध है ही, उन्हें नित्य ठाकुर के दर्शन भी होते। वे अपने अनुभवों की बातें श्री बलदेवदास जी को बताया करते। बलदेवदास जी पर इसका प्रभाव पड़ना स्वाभाविक था। उनका भक्तिभाव गुरुदेव के सानिध्य में दिन पर दिन बढ़ता गया। वे भी गुरुदेव की तरह मानसिक चिन्तन में लीन रहने लगे। कुछ दिन पश्चात् श्री ठाकुरदास जी धाम पधार गये, बलदेवदासजी उनके स्थान के महन्त हुए। महन्ताई का भार— वे अधिक दिन तक न झेल सके। उसे अपने गुरुभाई श्री ध्यानदास जी पर डाल केवल गुरुदेव की खड़ाऊँ लेकर भ्रमण के लिए निकल पड़े। चारों धामों की यात्रा की। उसके पश्चात् अधिकतर वृन्दावन में कालियदह पर या व्यासघाट में संत गोविन्द दास जी के पास रहने लगे। उन्होंने अपने लिए कभी किसी कुटिया का निर्माण नहीं किया। उन दिनों शुक सम्प्रदाय के दिल्ली गुरुवर के रसिक संत श्री मनमोहन दासजी, जिनका ‘प्रेम पयोनिधि’ ग्रंथ है, वृन्दावन के युगल घाट पर ग्वालियर वाले प्राचीन मंदिर में आकर रहा करते। उनका संग बलदेव दासजी अधिक से अधिक करते और उसमें अनिर्वचनीय सुख का अनुभव करते। दोनों संत प्रिया-प्रियतम की रसमयी बातें करते-करते भाव समाधि में डूब जाते। बलदेव दास जी नित्य प्रातः 3 बजे वृन्दावन की परिक्रमा को जाया करते। एक दिन परिक्रमा के मार्ग में उन्होंने देखा कि एक जगह बड़ा भण्डारा हो रहा है और बहुत से साधु बैठे प्रसाद पा रहे हैं। उन्होंने बलदेव दासजी से भी प्रसाद पाने को कहा। बलदेव दासजी ने कहा—“मैं इस समय प्रसाद नहीं पाऊँगा।” “तो परोसा लेते जाओ!” उन्होंने आग्रह करते हुए कहा। बलदेव दासजी ने परोसा अंगोछे में बाँध लिया। कुटिया पर पहुँचकर नित्य नियम से निवृत्त हो जब अंगोछा खोला तो यह देखकर वे आश्चर्यचकित हुए कि उसमें अखाद्य भरा है। उन्होंने अंगोछे सहित उसे फेंक दिया और फिर से यमुना स्नान कर अपने आपको पवित्र किया। दूसरे दिन जब वे फिर परिक्रमा को गये तो साधु रूप में उन भूतों की मण्डली से फिर उनकी भेंट हुई। वे कौतूहलवश रुककर फिर उनसे बातें करने लगे। उन्होंने कहा—“क्या तुम बता सकते हो, तुम्हारी ऐसी गति क्यों हुई?” उत्तर में उन्होंने कहा—“हम वृन्दावन के ही हैं। हमने ठाकुर सेवा के लिए प्राप्त धन और सामग्री का स्वयं उपभोग किया था। इसलिए हमें यह योनि प्राप्त हुई है। वृन्दावन में रहने के कारण यमराज का हमारे ऊपर अधिकार नहीं था। वे हमें न ले जा सके। इसलिए धाम में रहकर ही हम भूतेश्वर के शासन में अपने किए का फल भोग रहे हैं।” तात्पर्य यह है कि ठाकुर सेवा के निमित्त धन-सामग्री कुछ भी हो, यदि वह निजी उपयोग में ली गई तो उसे निम्न योनि में जाकर अखाद्य भक्षण करना पड़ेगा। श्री रामानुजाचार्य जी के चरित्र में आता है कि काँचीपुरी में राजकुमारी को ब्रह्मराक्षस की बाधा हो गई। बाधा दूर न होने पर राजा ने मन्त्राचार्य श्री यादव प्रकाश जी को बुलवाया जो श्री रामानुजाचार्य जी को पढ़ाते थे। यादव प्रकाश जी से ब्रह्मराक्षस बोला—“तुम तो मुझसे भी अधम हो, मैं तुम्हारे मंत्र से नहीं जा सकता। तुम पहले के जन्म में गोखरू (विष खोपड़ा) थे। तुम्हें संतसीठ प्रसादी मिल गई इसलिए तुम्हारा ब्राह्मण कुल में जन्म हो गया और मैं अनेक जन्मों से ब्राह्मण था लेकिन अशुद्ध मंत्रोच्चारण के कारण मुझे ब्रह्मराक्षस बनना पड़ा। मैं तुमसे तो नहीं किन्तु तुम्हारे शिष्य श्री रामानुजाचार्य जी के चरणोदक का पान कर इस राजकुमारी को छोड़ सकता हूँ।” अन्ततः श्री रामानुज जी के चरणोदक से ही उस ब्रह्मराक्षस का उद्धार करवाया गया। इससे यह बात सिद्ध है कि मंत्र अशुद्ध हो जाने से ही ब्रह्मराक्षस बनना पड़ता है तो ठाकुर जी की सेवा के निमित्त प्राप्त धन-सामग्री को खा जाने वाला तो निश्चित ही भूत-प्रेत बनेगा और अशिष्ट खाएगा। कर्मकाण्ड, अनुष्ठान आदि सम्पन्न कराने वाले, ठाकुर सेवा करने वाले को इस बात की विशेष सावधानी रखनी चाहिए। यहाँ ठाकुर सेवा के लिए प्राप्त धन को खा जाने वाले प्रेत बनकर अखाद्य खा रहे हैं। श्री बलदेव दासजी अच्छे संगीतज्ञ थे। वे नित्य तानपूरे पर आवेश में देर तक ठाकुरजी के सामने गान करते थे। श्रीमद्भागवत का नित्य पाठ करते थे और एक हजार दानों की तुलसी माला पर नाम जप करते थे। व्रज की लताओं के नीचे बैठकर लीला स्मरण करना उन्हें बहुत अच्छा लगता था। कभी-कभी किसी लता के नीचे बैठकर स्मरण करते हुए उन्हें सारा दिन बीत जाता था। क्षुधा-तृष्णा का भी लोप हो जाता था। एक दिन वे बरसाने गये हुए थे। वहाँ विलासगढ़ के निकट लताओं के नीचे बैठे भजन कर रहे थे। भजन में— इतना आवेश हो गया कि वे लगातार तीन दिन तक उसी स्थान पर बैठे भजन करते रहे। उनकी अयाचक वृत्ति थी। किसी से खाने के लिए कुछ माँगने का प्रश्न ही नहीं था क्योंकि उनका किसी को पता ही नहीं था। उस समय श्री राधारानी ने पुजारी से स्वप्न में कहा—“मेरा अनन्य भक्त बलदेवदास विलासगढ़ के निकट तीन दिन से भूखा है। उसे मेरा प्रसाद पहुँचा दो।” पुजारी ने तुरन्त श्रीजी की आज्ञा का पालन किया। बलदेव दासजी ने प्रेमाश्रु विसर्जन करते हुए श्रीजी का प्रसाद प्रेम से ग्रहण किया। फिर प्रतिष्ठा के भय से उस स्थान को छोड़ वे गहवर वन चले गये। वहाँ एकान्त में रो-रोकर श्रीजी से कहने लगे—“हाय, करुणामयी! इस अधम पर इतनी कृपा करती हो फिर अदृश्य रहकर विरह की वेदना क्यों देती हो? परोक्ष में कृपा कर उत्साह का वर्धन करती हो, प्रत्यक्ष में दूर रहकर प्राणों का मर्दन करती हो। कब तक इस तरह प्यास बढ़ाकर बिना तड़पाती रहोगी स्वामिनी?” इस प्रकार मन ही मन जब वे आक्षेप कर रहे थे, उन्होंने राधारानी को देखा, सखियों सहित वन-विहार में विचरण करते और उनकी ओर प्यार से दृष्टि फेरकर कहते—“मैं दूर कब हूँ तुझ से पगली?” तभी से उनकी स्वरूप सिद्धि हो गई और वे सिद्ध देह से मञ्जरी रूप में राधाकृष्ण की अष्टकालीन सेवा में रहने लगे। बाहरी सेवा-पूजा उन्हें कुछ भार स्वरूप लगने लगी। वे किसी योग्य शिष्य की कामना करने लगे, जिसे अपने ठाकुर और गुरुदेव की पादुका सौंप सकें। उसी समय उन्हें श्रीजी की प्रेरणा हुई अलवर के पास बहादुरपुर जाने की, जहाँ चरणदासी संत श्री दण्डौती रामजी का स्थान और उनके विहारी जी का मंदिर है। वहाँ श्री शिवदयालजी नामक एक नव किशोर अपनी ननिहाल में रहकर विद्याध्ययन करते थे। उनकी बिहारी जी के मंदिर में बलदेवदासजी से भेंट हुई। बलदेव जी जान गये कि उनके द्वारा भविष्य में चरणदासी सम्प्रदाय का विशेष उत्कर्ष होगा। इसलिए उन्हें शिष्य बनाकर और उन्हीं को अपने ठाकुर और गुरुदेव की पादुका सौंपकर वे निश्चिंत हुए। वही श्री सरस माधुरी शरणजी के नाम से चरणदासी सम्प्रदाय में एक प्रसिद्ध रसिक संत हो गये हैं। गुरुदेव की पादुका और अपने सेवित श्री विग्रह को सरस माधुरी जी को सौंप देने के पश्चात् अब उनके पास अपने शरीर के सिवा और कुछ न रह गया। सरस माधुरी शरण जी को अपनी इस अलौकिक सम्पत्ति को सौंप देना इस बात का संकेत था कि वे शरीर को भी वसुन्धरा को सौंपकर अपनी लीला संवरण करने जा रहे हैं। तदनुसार सं० 1958 आषाढ़ सुदी नवमी को उन्होंने अपनी लौकिक लीला संवरण कर राधाकृष्ण की दिव्य लीला में प्रवेश किया।