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श्री स्वामी श्री सरस माधुरी शरण जी महाराज
श्री शुक सम्प्रदाय • सप्तम आचार्य (पीठ संस्थापक)

श्री स्वामी श्री सरस माधुरी शरण जी महाराज

Shri Swami Saras Madhuri Sharan Ji Maharaj

प्राकट्य: श्रावण बुदी ३०, सं० १९१२ वि०
धाम गमन: मार्गशीर्ष सुदी १४, सं० १९८३ वि०, शनिवार (स्थान- सरस निकुंज)
निवास / पावन स्थल: श्री सरस निकुंज, जयपुर

पावन चरित्र एवं जीवन दर्शन

श्री स्वामी सरस माधुरी शरण जी श्री सरसमाधुरी शरण जी का जन्म हुआ ग्वालियर राज्यके मंदसौर ग्राम में एक गौड़वंशीय ब्राह्मण परिवार में। पिता का नाम था श्री घासीराम जी और माता का पार्वती देवी। सरसमाधुरी जी के जन्म का नाम था-*शिवदयाल'। शिवदयाल जी के पूर्वज अलवर राज्य के अंतर्गत खानपुर ग्राम के मूल निवासी थे पर मध्य प्रदेश में मंदसौर के सरसूबा होते आये थे। सरसूबा को दीवानी और फौजदारी के सब अधिकार होते थे। वह एक प्रकार से सूवे का मालिक होता था। उसे केन्र स्थान को सिर्फ एक चौथ देनी होती थी। शिवदयाल जी के दादा महादयालजी और पिता घासीरामजी भी मंदसौर के सरसूबा थे। घासीराम जी की एक कुशल प्रशासक और परम धार्मिक व्यक्ति के रूपें ख्याति थी। उनकी ली पार्वती देवी भी एक पतिव्रता और धर्म परायण नारी थीँ। वे बहादुरपुर (अलवर) की थीं, जहाँ श्री महाराज चरणदास जी का ननिहाल था। घासीराम जी की कई संतान मर चुकी थी। उसके बाद सं० 1912 में;श्रावण की हरियाली अमावस के दिन शिवदयालजी का जन्म हुआ था। उनके बाद उनकी छोटी ब्रहन भी जन्मी थां। घासौराम जी परम भागवत थे। चे शुक सम्प्रदाय में दीक्षित थे। सं 1914 की क्रांति के समय वे सूबेदारी छोड़कर खानपुर चले आये और भजन साधन में लग गये। पारिवारिक राग-ट्वेष के कारण खानपुर का वातावरण उन्हें अनुकूल न पड़ा। इसलिए वे पैतृक संपत्ति को तिलाञ्जलि दे बहादुरपुर जाकर रहने लगे। शिशु शिवदयाल अपनी सुन्दर नयनाभिराम मूर्ति और बाल सुलभ चापल्य के कारण पास-पड़ोस के नर नारियों के आकर्षण का केन्द्र थे। वे 2 वर्ष के थे तभी ड असाधारण प्रकृति का पता चलने लगा था। उनके खेलकूद साधारण बालकों से भिन्न होते। वे कभी मिट्टी की भ बनाकर उनकी सेवा पूजा का खेल खेलते, कभी संध्या-वन्दनादि का और कभी बालकों के साथ 'हरे कृष्ण हे जञ कीर्तन का। वे 5 वर्ष के हुए तब उनकी पढ़ाई लिखाई की समुचित व्यवस्था की गई। उनकी बुद्धि कुशाग्र थी। इ समय उर्दू फारसी का प्रचार अधिक था। इसलिए उन्हें हिन्दी के साथ उर्दू और फारसी भी पढ़ाई गई। कुछ ही हि में उन्होंने इन भाषाओं का अच्छा ज्ञान प्रात कर लिया। शिवदयालजी के भक्ति के संस्कार शैशव से ही प्रबल इसल्लि थे कि उनके पूर्वज शुक सम्प्रदाय में दीक्षित होते आये थे। बहादुरपुर में इन संस्कारों को पनपने का सुअवसर मल्ल क्योंकि यहाँ इसी सम्प्रदाय के संत श्री दण्डौती रामजी का स्थान था और बिहारी जी का मंदिर, जहाँ संत आया करते शिवदयालजी उन संतों का संग और उनकी सेवा किया करते। उनका भक्तिभाव देख माँ को चिन्ता हुई कि वे दै न हो जायें। उन्होंने व्रज के पालकी ग्राम की एक कन्या से उनका बिवाह कर दिया पर इससे उनके भक्तिभाव छे अन्तर न पड़ा वह दिन पर दिन बढ़ता गया। विवाह के 5वर्ष बाद एक पुत्री को जन्म देकर उनकी पत्नी परलोब सिधार गयी। उससे भी वे विचलित न हुए। भक्ति का बीज जिसे वे जन्म से लेकर आये थे वयस बढ़ने के साथ-साथ अंकुरित और पल्लवित पुष्पित होता गया। अब उसे एक योग्य माली की आवश्यकता थी जो उसे सजाता संवारता तथा अपने उपदेशामृतसे सांच कर पुष्ट करता। शिवदयाल जी भक्ति लता को संवारने वाले सदगुरु रूपी माली की खोज में लग गये। उनके लिए उनकी उत्कं दिन प्रति दिन बढ़ती गयी। आखिर प्रभु ने उनकी मनोवांछा पूर्ण की। शुक सम्प्रदाय के श्री रामरूप द्वारे के सिद्ध संत श्रीबलदेवदास जी बहादुर आया करते थे वे शिवदयालजी के भक्तिभाव से प्रभावित थे। शिवदयाल जी ने प्रभु की प्रेरणा से उन्हीं से दीक्षा के लिए प्रार्थना की। उन्होंने प्रार्थना स्वीकार की। दीक्षा देकर नाम रखा-सरसमाधुरीशरण। उन्होने उन्हें श्री रामसखी जी की वाणी 'भक्ति रस मंजरी' के अनुसार निकुञ्ज रसोपासना की रीति सिखाई।' उन्नीस सौ तैतीस की, चैत्र शुक्ल शुभ तीज। 'सरस' हृदय बलदेव गुरु, बोयो भक्ति रस बीज॥ श्री बलदेव दास जी परम रसिक संत थे, जुगल के प्रेम में सदा सराबोर रहते थे। उन्हें पाकर सरसमाधुरी जी धन्य हुए, उन्होंने लिखा रसिक गुरु भागन सों पावे। जो कोई सरन गहे श्रद्धा करि, ताको रस को पात्र बनावें॥ जुगल नाम दे दान जीव को, विषय वासना सकल नसावें। ब्रह्मनंद निरस लखि मन में, प्रेमानन्दहि माहि छकावें॥ रस निकुञ्ज कहियत अति दुर्लभ, जोई जाने जेहि गुरु जनावें। निरस भेद कहा जाने रस को, खल गुड़ एकहि भाव बतावें॥ जाने कहा स्वाद अमृत को, विष को कीरा विष मन लावें। “सरस माधुरी' महल भावना, हर काहु के हाथ न आवें। अब उन्होंने चैन की सांस ली। जीवन का सारा भार गुरुदेव पर छोड़कर निश्चिंत हुए- लज्जा मेरी गुरुन को, उनही को आधार। 'सरस माधुरी' गुरु शरन, सोबत पाँव पसार॥ (श्री रामरूप जी का जी० च०, 56) अब वे द्रुतगति से साधना पथ पर चल पड़े। रात्रि में तंबूरा लेकर जुगल का गुणगान करते, दिन में जीविका निर्वाह (लिए थानेदारी के पद पर कार्य करते। पर उन्हें थाेदारी में तो जीवन व्यतीत करना था नहीँ। प्रभु ने उन्हें भेजा दा करिसी महत्वपूर्ण कार्य के लिए। उन्हं शुक सम्प्रदाय का नव-उज्जीवन करना था। जयपुर मे सम्प्रदाय की गद्दी की थापना कर आचार्य रूप से सम्प्रदाय की 'रसोपासना को सुदृढ़ और प्रगतिशील करना था। संसार के अगणित जीवों का उद्धार करना था। उन्हें क्या इसका पता था? पर कोई अज्ञात शक्ति एक पूर्व निश्चित योजना के अनुसार उनके जने बिना ही उन्हें उस ओर ले जा रही थी। योजना का प्रथम चरण था उनका जयपुर स्थानान्तरण। उस शक्ति की ररणा से उन्होंने जयपुर जाकर रहने का निश्चय किया। जयपुर जाने में कोई विशेष बाधा तो थी नहाँ। उनकी पत्नी कका पहले ही देहान्त हो चुका था। माँ भी इस बीच परलोकगामिनी हो चुकी थी। अपनी बहिन और पुत्री का उन्होंने याह कर दिया। नौकरी से इस्तीफा दे दिया। पिताजी को साथ ले जयपुर चले गये और अपने गुरुभाई उमरावजी भार्गव के घर रहने लगे। कुछ दिन पुलिस विभाग 'में नौकरी की। फिर नौकरी छोड़ वकालत करने लगे। जयपुर का वातावरण भवित के लिए विशेष रूप से अनुकूल था। 'वहाँ अनेक प्राचीन देवालय थे। और वहाँ के राजा-प्रजा भक्ति-परायण होते आये थे। इस अनुकूल वातावरण में उनके हदय में उगी भक्ति लता अधिकाधिक बढ़ने लगी। उसके पुष्पों के सौरभ से जयपुर का आकाश सुरभित हो उठा। भक्त-भ्रमर उससे आकृष्ट हो उसके चारों ओर मँडराने लगे। इष्ट-गोष्ठी आदि का समाज जुड़ने लगा। एकादशी के दिन का कार्यक्रम भक्तों के लिए विशेष रूप से आकर्षक होता। उस दिन सरसमाधुरी जी का सारा दिन हरिचर्चा में व्यतीत होता। रात्रि 8 बजे से प्रातः 8 बजे तक सब लोग जागरण करते। जागरण में प्राचीन संतों की वाणियों और “सरस माधुरीजी के स्वरचित पदों का राग-रागनियों के साथ गायन होता। गाते-गाते सरस माधुरी जी विरह भाव में डूब कर क्रन्दन करने लगते। क्रन्दन करते-करते उनकी हिचकियाँ बँध जाती। उनका भाव अन्य लोगो में संक्रमित 'होता। वे भी क्रन्दन करने लगते। उस क्रन्दन में उन्‍हें जो सुख मिलता, उसमें वे संसार को भूल जाते। गाते-गाते कभी “सरस माधुरी जी आनन्द-नृत्य करने लगते। तब आनन्द की एक और लहर समाज को प्लावित कर देती। रोने-गाने (और नाचने कूदने में रात किधर निकल जाती, किसी को पता न चलता। श्री प्रेम स्वरूपजी ने अपने ग्रंथ ' आदर्श संत' में एकादशी की रात्रि के सरस माधुरी जी के नृत्य-कीर्तन के संबंध मे लिखा है- "जब वे तानपूरा लेकर साज-बाज 'के साथ गायन करते-तो लोग मंत्रमुग्ध हो जाते। ऐसा लगता जैसे समाज श्रीकृष्ण के निकुंज में ही हो रहा हो। वे रात्रि 8 बजे से प्रातः 8 बजे तक एक स्वर और एक आसन से गायन करते रहते। कभी-कभी प्रेम में मान हो खड़े होकर जृत्य करने लगते तो घ्टों नृत्य करते रहते। 4-4 घण्टे पर साजिंदे बदल जाते, पर वे जमे रहते, उन्हें आलस्य और निद्रा स्पर्श भी न करते'” धीरे-धीरे सरस माधुरी जी के जागरण काल के सत्संग की चर्चा दूर-दूर तक फैल गयी। दूर-दूर से वैष्णव मंडलियाँ आकर इसमें सम्मिलित होने लगी। जयपुर के बहुत से संभ्रान्त परिवारों के लोग और राजकर्मचारी भी इसमें आने लगे। जयपुर नगर में भक्ति-भागीरथी, जो कुछ दिनों से क्षीण और शिथिल हो गयी थी, अब फिर वेग से बहने लगी। उसे और भी संपुष्ट करने के लिये सरस माधुरी जी ने एक और कार्य किया। उन्होंने अपने एक भक्त दीनानाथ जी को प्रेरणा देकर जयपुर में एक रास- मंडली का निर्माण करवाया तथा रास-मंडली द्वारा अभिनीत होने के लिए ब्रज-लीलाओं और भक्त चरितरों की रचना की। लीलाएँ. होने लगीं। लौलाएँ इतनी सफल हुई कि जयपुर में उनकी धूम मच गयी। उनकी प्रशंसा सुन जयपुर के तत्कालीन महाराजा सवाई माधोसिंह द्वितीय की भी इच्छा हुई उन्हें देखने की, मण्डली को दरबार में आमन्त्रित किया गया। सुदामा-लीला का अभिनय हुआ। माधो सिंह जौ पहले ही भक्ति भाव सम्पन्न थे। सरस माधुरीजी के सम्बन्ध में भी उन्होंने सुन रखा था। पर इस लीला को देख उन्हें उनके प्रति विशेष आकर्षण हुआ। उन्हें भी एक दिन ३ रो दरबार में आमंत्रित किया। वे उनके भक्ति भाव से बहुत प्रभावित हुए। तब से जब कभी रास का आयोजन र न उन्हें अवश्य आमंत्रित किया जाता। अकसर जब माधो सिंह जी वृन्दावन जाते, उन्हें अपने साथ ले जाते। उनके य से व्रजवासियों की और वहाँ के देवालयों और बहुत सेवा करते। माधोसिंह जी ने उनकी भी सेवा करने की इच्छ प्रकट की पर उन्होने सेवा स्वीकार नहीं की। उनके बहुत आग्रह करने पर उन्होने दीनानाथ जी की मण्डली के मागि खर्च के लिए कुछ अनुदान की व्यवस्था कर देने को कहा जो उन्होंने सहर्ष कर दी। साथ ही चाँद पोल बाजार मं स्थित एक विशाल मंदिर भी उन्होंने दीनानाथ जी को दे दिया, जो आज भी उनके वंशजों के पास है। माधो झि र जी के माध्यम से सरस माधुरी जी का सम्पर्क कृष्णगढ़ के महाराजा से भी हो गया। वे भी उनके प्रति विशेय श्र रा रखते और प्रतिवर्ष अपने उत्सवों में उन्हें बुलाया करते। एक दिन सरस माधुरी जी के घर में चोरी हो गई। चोर सारा सामान समेट ले गये। सरस माधुरी जी उससे तनिक भी विचलित न हुए। दैवयोग से उसी समय उनकी बहिन क्े लड़के बिहारी लाल का व्याह होने को हुआ। उन्हें भात लेकर भातोर ग्राम जाना था। अब एक विकट समस्या खर हो गई। घर में जो था वह तो चोर ले गये, भात के लिए सामग्री आये कहाँ से। पर इससे भी सरस माधुरी जी विचलित न हुए। उन्होंने मन ही मन कहा-जिसने चोरी करवाई, वही भात की व्यवस्था करेगा, नहीं करेगा तो नहीं करेगा उसको जैसी इच्छा। इसमें मेरा क्या? आश्चर्य! भात की सारी व्यवस्था हो गयी। भात ऐसा गया कि गाँव वाले देखकर चमत्कृत रह गये। सरस माधुरी जी के पिता उनका भगवत्‌-अनुराग और निष्ठा देख-देख फूले नहीं समाते थे। वे सांसारिक किसी कार्य से तो संबंध रखते नहीं थे। दिन रात भजन साधन में लगे रहते थे और सरस माधुरी जी के क्रिया कलाप देख अपने को धन्य मानते थे। एक दिन अकस्मात्‌ उन्हें निकट बुलाकर बोले-''बेटा! मं तुम्हारे जैसा पुत्र पाकर अपना जीवन सफल मानता हुँ अब मेरा समय हो गया है। मैं जाऊँगा।” यह सुन सरस माधुरी जी के नेत्रो में आँसू आ गये। रुँधे कण्ठ से उन्होंने कहा--''पिताजी! क्या सममुच आप मुझे छोड़ जायेंगे ?'' उन्होंने सरस माधुरी जी के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा--'' तुम चिन्ता बिल्कुल न करो। हम फिर मिलेंगे। मेरा आशीर्वाद है कि तुम जिस कार्य के लिए आये हो, उसे पूरा कर उस नित्य धाम में मुझसे और गुरु वर्ग से आ मिलो। जहाँ मिलकर बिछुड्ना कभी नहीं होता।'' इतना कह वे परमधाम को पधार गये। आजकल सरस माधुरी जी जिस मकान में रह रहे थे उसके ऊपर की मंजिल में एक बड़ा कमरा था, जिस पर छप्पर पड़ा हुआ था, उसी में ठाकुर सेवा और भण्डार था। एक दिन उसमें आग लग गयी। उस समय सरस माधुरी जी नीचे थे। आग की लपट जब ऊँची उठने लगीं, तब उन्हें पता चला। वे भागकर ऊपर गये। बिना कुछ सोचे विचारे आग में कूद पड़े और अपने ठाकुर को निकाल लाये। ठाकुर की कृपा से वे न जाने कैसे अग्नि में से अछूते निकल आये। भण्डार का सारा सामान जलकर खाक हो गया। सरस माधुरी जी जब से जयपुर आये, तब से अभी तक उनके रहने के मकान की समुचित व्यवस्था नहीं हुई थी। वे कभी किसी मित्र के मकान में रहे कभी किराये के मकान में। पर अब उनके पास दूर-दूर से अतिथि, अभ्यागत और संत आते रहते। वृन्दावन से सिद्ध संत श्री हंसदासजी और ब्रजराज सखा ग्वारिया बाबा आदि आते। अयोध्या से भी कई संत आया करते। सुविधाजनक आवास स्थान और सत्संग भवन की बड़ी आवश्यकता थी। इसलिए उन्होंने दरीबा पान में श्री सरस कु नामके अपने स्वतंत्र स्थान का निर्माण किया जिसमें सत्संग भवन, रास मण्डल और ठाकुर मंदिर आदि बनवाये गये। कुञ्ज में आचायोँ के उत्सव, लीलानुकरण, भागवत-पाठ, कीर्तन, साधु-सेवा आदि की समुचित व्यवस्था की गई जो अभी तक चल रही है। यह स्थान ही अब जयपुर में श्री शुक सम्प्रदायका प्रधान स्थान माना जाने लगा है। सरस माधुरी जी का भजन में अभिनिवेश अब पहले से और भी अधिक बढ़ गया। वे रात्रि बारह बजे से ही उठकर भजन में बैठ जाते। भोर तक मानसी सेवा करते। उसके पश्चात्‌ स्नानादि कर मंत्र जपादि करते। उनकी मानसिक वा शंगारत्मक थी। वे शुक सखी और चरणदासी सखी (प्रेम मंजरी) के आनुगत्य में सेवा करते। कभी राधा-कृष्ण रो वीणा वादन से रिझाते, कभी नृत्य गान से। वन-विहार में चंवर ले उनके पीछे-पीछे चलते, कभी पान की डिब्बी और इत्र की शीशी लिए, कभी रूमाल से भौरों को उड़ाते हुए। एक बार उन्होंने वृन्दावन के सिद्ध संत श्री जगन्नाथदासजी जे दीनभाव से कृपा को प्रार्थना की। उन्होंने हँसते हुए कहा--“"तमहं कृपा? मै जानता हूँ तुम कौन हो। मने तुम्हें श्रीशुक 'सखी जी के आनुगत्य में प्रिय-प्रितम की पान की सेवा करते देखा है”'। उनकी सेवा में एक चित्रपट था। वर्ष ऋतु में उसके पीछे लगा काष्ठ कड़ा हो गया। तब एक दिन ठाकुर ने सवण में उनसे कहा--''मेरी पीठ में काठ चुभ रहा है''। उसी समय उन्होने स्नान कर काष्ठ अलग किया और भोग अर्पण कर तथा आरती कर आरामसे उन्हें शयन कराया। इसी प्रकार कभी सरस कुझ के पुजारी ठाकुर की झारी भरना भूल जाते, तो वे स्वप्न में सरस माधुरी जी को आज्ञा दे झारी भरने को कहते। सरस माधुरी जी की प्रसिद्धि इस समय पराकाष्ठा पर थी। जयपुरके भकत समाज के नायक के रूप में उन्‍हें माना जाने लगा था। जयपुर में “रामसभा' नाम 'का एक सत्संग मण्डल था, जिसकी प्रति सप्ताह बैठक हुआ करती। उसके भी वे कर्णधार बन गये। उनके प्रयास से उसका बहुत विस्तार हुआ। जगह-जगह उसकी शाखाएँ खुल गई। वे हर शाखा में जाकर प्रवचन कीर्तनादि करते। उनके उपदेशों से लोग बहुत उपकृत होते। क्योकि उनमें कोई साम्प्रदायिकता तो थी नहीँ। जो जिस सम्प्रदाय का व्यक्ति होता, उसको वैसा उपदेश करते। उनके अपने स्थान पर भी भवतों का समागम दिनों दिन बढ़ता गया। केवल वैष्णव भकत ही नहीँ, झानी,योगी यहाँ तक कि कुछ मुसलमान भकत भी उनके समाज में अकसर जुड़ जाया करते। उनके सहयोग से कव्वालियों का कार्यक्रम भी उनके यहाँ कभी-कभी हुआ करता। भक्तों और अभ्यागतों की सेवा वे बड़े यल से किया करते। गुरु श्री बलदेवदास जी भी उनके घर कभी-कभी आ जाया करते। वे उनके यहाँ भकतों का समागम और उत्सवादि के कार्यक्रम देख बहुत प्रसन्त होते। पर उन्हें गृहिणी का अभाव खटकने लगता। केवल इसलिए नही कि अभ्यागतों की सेवा के लिए उसकी नितान्त आवश्यकता जान पड़ती, इसलिए भी कि उन्हें उत्तरकाल में सरसमाधुरी जी को आचार्य पद पर प्रतिष्टित करना था और उनकी गद्दी की परम्परा उन्हीं के बंशजों द्वार चलते रहने की व्यवस्था करनी थी। उन्होंने सरस माधुरी जी को दूसरा विवाह कर लेने की आज्ञा दी। सरस माधुरी जी दूसरा विवाह करना नहीं चाहते थे। वे गुरु-आजा टाल भी नहीँ सकते थे। इसलिए वे बड़े असमंजस में पड़ गये। उन्हें अनमना देख गुरुदेव ने एक लीला की। एक दिन जब सरसमाधुरी जी बाहर गये हुए थे, वे घर में गृहिणी की तरह चक्की पीसने बैठ गये। सरस माधुरी शरण जी लौटकर आये तो देखा कि गुरुजी चवकी पीस रहे है, वे पसीने से लथपथ हैं और एक सुन्दर बालक पीछे खड़ा पंखा झल रहा है। यह देख वे बहुत लज्जित हुए-'“गुरुदेव! यह आप कया कर रहे हैं? कहते हुए वे उनके चरणों में गिर पड़े। उठकर खड़े हुए तो देखा कि वह बालक नहीं है। कौतूहल वश उन्होंने गुरुदेव से पूछा-'' वह लड़का कौन था? गुरुदेव ने कहा-'' कौन लड़का? यहाँ तो कोई भी नहीँ था।” सरस माधुरी शरणजी समझ गये कि उनके दूसरे विवाह का प्रयोजन गुरु को ही सुखी करना नहीँ हैं, ठाकुर कौ भी यही इच्छा है क्‍योंकि गृहिणी के अभाव में गुरुदेव को चक्की पीसनी पड़ी और ठाकुर को उनके पीछे खड़े होकर उनकी टहल करनी पड़ी। इसलिए उन्हें विवाह के लिए नाक-भौं सिकोड़े अनुमति देनी पड़ी। गुरुजी ने उन्हें आश्वस्त किया कि उनकी दूसरी पली भी जियेगी पाँच ही वर्ष। इसलिए उन्हें बहुत दिन तक वैवाहिक जीवन व्यतीत करना नहीं पड़ेगा। जीवेगी पाँच ही बरस, मन में करो न ग्लान। दो सुत उससे होयेंगे, यह कहना लो मान॥ पहिलो अल्पहि आयु में, जावे धाम सिधाय। दूजो पावन करैगो, तारन तरन कहाय॥ (श्री सरस प्रताप, पृ० 4) गुरुजी स्वयं पिता की तरह बारात सजाकर अपनी ही शिष्या अलवर राज्यानतर्गत लिली ग्राम की परम आनन्दीबाई से विवाह करा लाये। विवाह सं०1951 में हुआ। उसके पाँच ही वर्ष बाद आनन्दीदेवी, गोविन्द शरण और राधेश्यामशरण जी(रसिक माधुरी शरणजी) नाम के दो पुत्रों को जन्म देकर निज अभीष्ट धाम को चली गयाँ। बच्चों के पालन-पोषण के लिए उनकी सास अपने बालक रूपनारायण के साथ सरसमाधुरीशरण जी के घर रहने लगीँ। श्री सरस माधुरी शरण जी की गुरु निष्ठा और आचार्य निष्ठा अद्वितीय थी। वे श्री गुरु या आचार्य के नाम को हरि के कोटि नामों से और गुरु के एक उत्सव को हरि के कोटि उत्सवों से बड़ा मानते। कोटि नाम हरि के जपे, एक आचारज नाम। तुले नहीं सम तासु की, जपो रसिक निशियाम॥ कोटि जनम उत्सव हरि, गुरु उत्सव पर वार। इक रसना नहिं कह सकै, महिमा अपरम्पार॥ (श्री सरस सागर) इस प्रकार वे गुरु और आचार्य को भगवान्‌ से भी अधिक महत्त्व देते। वे कहते कि हरि के रोम-रोम में ब्रह्माण्ड हैं, आचार्य के रोम-रोम में श्री हरि हैं। स्व॑त्रत रूप से हरि की उपासना करने से करोड़ जन्म में भी हरि नहीं मिलते। ' आचार्य के आनुगत्य में भजन करने से वे सहज ही मिल जाते हैं- ज्यों हरि के प्रति रोम में, लटकत अमित विराट। त्यों श्री गुरु प्रति रोम में, युगल रूप के ठाट॥ सतगुरु हिये भण्डार में, अगनित राधेश्याम शरणागत को देत है, लें नहिं एक छदाम॥ ज्यों हाथी के खोज में, सकल समावत खोज। त्यों आचार्य उत्सव में, सब उत्सव की मोज॥ मेरे साधन है नहीं, जप-तम नेम अचार। श्री आचारज गुरु चरण, सोबत पाँव पसार॥ कोटि जन्म दुर्लभ सुपद, रंग महल अधिकार। जन्म एक में सुफल हो, कृपा गुरुन की सार॥ (श्री सरस सागर) इसीलिए. श्री सरस माधुरी शरणजी आचार्य जयन्ती उत्सवों को श्री हरि के उत्सवों से भी अधिक महत्त्व देते। चे परम रसिक भक्त थे। उन्होंने प्राय: सभी वैष्णव आचायोँ की वन्दना के सुन्दर पदों की रचना की है। उन्हें पढ़कर अनुमान लगाना कठिन हो जाता है कि वे किस सम्प्रदाय के थे। उनमें किसी प्रकार की साम्प्रदायिकता का दुराग्रह छूकर भी नहीं गया था। वे सभी सम्प्रदायों के आचायों के उत्सव उतनी ही धूमधाम से मनवाते जितनी अपने संप्रदाय चायो के। यह आचार्य रूप में उनकी एक बड़ी विशेषता थी पर थी उस समग्रदाय का ही विशेष प्रति फलन, चे आचार्य थे। श्री शुक सम्प्रदाय आचार्य महाप्रभु श्री श्यामचरणदासजी द्वा प्रवर्तत, श्री शुकदेव जी महामुनीनद्र गवत में प्रचारित परम उदार प्रेम-धर्म पर आधारित है, इसलिए सभी सम्गदायों के प्रति ग्रेम भाव उनके सम्प्रदाय बिशेषता है। आचार्य-जयन्ती उत्सवो में वे दो उत्सव विशेष रूप से मनाया करते। महामुनीन््र श्री शुकदेव जी महाराज त्सव वैशाख कृष्ण अमावस्या को, और महाप्रभु शरी श्यामचरणदासजी का उत्सव भाद्र शुवल तृतीया को। प्रत्येक बड़े समारोह के साथ तीन दिन तक लगातार चलता रहता। उत्सव के सभी अंग-बधाई गान, अभिषेक, रात्रि- , नृत्य-कीर्तिन, नगर-परिक्रमा, भण्डारा आदि बड़े उल्लास के साथ मनाये जाते। दूर-दूर से गुणी गण और बिना निमंत्रण के आकर उत्सव में सम्मिलित होते। उनका सबका यथोचित सत्कार किया जाता। सब आशा अधिक प्रसाद और पुरस्कार पाकर आनन्दित होते। साधु सन्त सतगुरु ढिग आवै। कर सनमान निकट बैठावै॥ भक्तजनन सों सेव करावें। असन बसन अर्पन करवावें॥ ब्रजवासी आवें सुखरासी। दम्पति प्रेमानन्द विलासी॥ कथा कीर्तन सुनें सुनावें। हरि मिलने की डगर बतावें॥ (श्री सरस सतगुरु विलास) इन उत्सवों में सरस माधुरी शरणजी स्वयं नृत्य कीर्तन करते, रात्रि के जागरण में विशेष रूप से नृत्य-कीर्तन करते- स्वयं भाव समुद्र मं डूब जाते और दूसरों को भी डुबा देते-- नहीं जम्हाई आलस आवे। हुलसि हुलसि हरि गुण गण गावे॥ कबहुँ प्रेम मगन हो जावें। गद्गद्‌ स्वर दृग जल बस्सावें॥ गुणावाद गा आप छकावें। प्रेम सिन्धु में रसिक डुबावें॥ हरिरस छक हरिजन जब झूमें। श्री गुरु के चरनन का चूमें॥ (श्री सरस सतगुरु_विलास) श्री सरसमाधुरी शरण जी ने महाप्रभु श्री श्यामचरणदास जी का जयन्ती उत्सव उनके जन्म स्थान डहरा में भी मनाने 'की परिपाटी डाली, जो आज तक चली आ रही है। उसमें दूर-दूर से भक्तगण पधारते हैं। बधाई-गान, अभिषेक, 'भागवत-कथा, नृत्य कीर्तन आदि के बाद तीसरे दिन नगर-कीर्तन निकाला जाता है। प्रथम बार जब उत्सव मनाया गया, 'जगर-कीर्तन अलवर जग में निकाला गया। अलवर में प्रथम बार इस भव्य आयोजन को देख लोगों की भीड़ उमड़ 'पड़ी। कीर्तन जब मार्ग में एक मस्जिद के निकट पहुँचा, मस्जिद से मुल्ला-मौलवी और उनके समर्थक मुसलमानों ने 'तरिकलकर आपत्ति की। रंग में भंग हो जाने की आशंका से सब चिंतित हो पड़े। पर सरसमाधुरी जी ने मुल्लाओं को 'हदय से लगाया और स्वरचित इस गजल को गाना आरम्भ किया- हरशै में श्यामसुन्दर, देखा जहूर तेरा। चरचा फलक पे हुस्न का, करती हैं हूर तेरा॥ हर रंग में तू शामिल, समझें ये रम्ज कामिल। हर चारसू चमकता, रोशन है नूर तेरा॥ दिल में समा रहा है मुझको तू भा रहा है। आँखों में छा रहा है हरदम सरूर तेरा॥ हर बुत कदे में तू ही, काबे में तू ही आया। आरफों ने जान पाया जलवा जहुर तेरा॥ अहले हिनूद कोई कोई बना मुसलमाँ बरपा किया हुआ है, सारा फुतूर तेरा॥ सरताज तू हमारा तन मन ये तुम पे वारा। खादिम 'सरस' हमेशा हाजिर हूजूर तेरा॥ गजल सुन मुसलमान आत्म विभोर हो “वाह'! वाह! की ध्वनि के साथ स्वयं संकीर्तन में नृत्य करने 'सरसमाधुरी शरणजी के अलौकिक प्रभाव से संकट के बादल शीघ्र छंट गये। श्री बलदेवदासजी महाराज के धाम गमन का समय अब बहुत दूर नहीँ था। वे जाने से पहले सरसमाधुरी 'को आचार्य पद पर प्रतिष्ठित देख लेना चाहते थे क्याँकि वे अब सब प्रकार से इसके योग्य थे। एक दिन उन्होने मन्तव्य प्रकट करते हुए कहा- सरसमाधुरी तुम सुनो, कहूँ बात समुझाय। शिष्य शाखा अब तुम करो, हमरी आज्ञा पाय॥ सरसमाधुरी जी यह सुनकर चौंक पड़े। उन्होंने कहा--'*महाराज! मैं गृहस्थी कया शिष्य बनाने के योगय हूँ बलदेवदासजी ने कहा-कहा गृही और कहा वैरागी। भजच करै सोड जन बड़भागी॥ एक सौ यीह़ी तारै। और बहुत जग जीव उबारै॥ वेदव्यासजी जगत गुरु, गृहस्थ आश्रम माहिं। आचारज शिरमौर प्रभु, तिन सम कोउ नाहिं॥ श्री सरसमाधुरी शरण जी को आज्ञा माननी पड़ी। कई वर्ष बाद जब श्री बलदेव दासजी वृन्दावन से जयपुर आगे, चे सरसमाधुरी शरण जी की शिष्य मण्डली देख बहुत प्रसन्न हुए- कई साल गुरु जयपुर आये। भवत मण्डली देख सिहाये॥ श्री सरसमाधुरी शरणजी के सैकड़ों शिष्य हुए, जिनमें गृहस्थ भी थे, विरक्त भी। उनके शिष्यों में सैकड़ों समभरन्‌ परिवारों के सुशिक्षित लोग थे। उनके उपदेश इतने प्रभावशाली होते कि बहुत से प्रोफेसर और वकील आदि पाश्चात्य शिक्ष प्रप्त तर्कशील लोग, जो आते उनसे तर्क करने, वे भी उनके आगे नतमस्तक होते और उनका शिष्यत्व ग्रहण कर धन्य होते। उनके शिष्यो में प्रधान थे-्री रूपमाधुरी शरण जी, श्री ग्रेम माधुरी बाई जी,श्री जुगल मनोहर शरणजी, शरी राधावल्लभशरण जी, श्री जुगल माधुरी जी, पं० रामगोपालजी और मोहम्मद याकूब सनम साहब। शिष्यं के प्रतिं सरस माधुरी शरणजी का व्यवहार बहुत मधुर और वात्सल्यपूर्ण होता। वे उन्हें अपना आत्मा ही मानते। उनके सुख- दुख को अपना सुख-दुख मानते और उनके कल्याण की चिंता रखते। उनके ऊपर कोई संकट आता तो उन्हें पहले ही व्याप जाता और वे यथासंभव उसे दूर करने की चेष्टा करते। एक बार उनकी शिष्या प्रेममाधुरीबाई जी बहुत बीमार हुई। उनके बचने की कोई आशा न रही। उन्होंने गुरुदेव का स्मरण किया। उस समय सरस माधुरी शरणजी सत्संगियों के बीच बैठे थे। सहसा उठकर प्रेममाधुरी बाई जी के घरकी ओर चल दिये। उन्हें आया देख घर के लोग चकित रह गये। सरसमाधुरीशरणजी ने प्रेममाधुरी बाईजी के सिरहाने बैठ उनके सिर पर स्नेह से हाथ फेरा और कहा--' चिन्ता न करो। श्री शुकदेव जी मंगल करेगे। तुम्हरे वारा उन्हें बहुत काम करवाना है'' यह आर्शीवाद देकर वे चले गये। ग्रेमामाधुरीबाई जी उसी समय से स्वास्थ्य लाभ करने लगीं। 'सरसमाधुरी शरणजी के अनन्य भवत मारोठ के सवाई सिहं जी राठौड़ के पेट में दर्द होता, इसलिए वे हुक्का 'पौया करते। संकोच वश सरस माधुरी शरणजी के सामने न पीते, जिसमे उन्हें कष्ट होता। सरसमाधुरीशरणजी को उनकी „ क्रा पता चल गया। एक दिन उन्होंने पेट में दर्द का बहाना करते हुए कहा-''कोई हुक्का भर लाये तो पीने | दर्द जाता रहे।'' ठाकुर साहब हुक्का भर लाये। हुक्का मुख से लगा सरसमाधुरीशरण जी बोले-'' शरीर तो } करने के लिए है। इसे ठीक से रखना चाहिये।'' ठाकुर साहब की परेशानी दूर हुई पर कुछ दिनों बाद उन्होंने | पीना छोड़ दिया। ससमाधुरीशरण जी अपने धनी मानी शिष्यों की अपेक्षा गरीब और असहाय शिष्यों का अधिक ध्यान रखते। दवार व्यास पूजा के दिन बात को सभी ने लक्ष्य किया। उस दिन शिष्य सेवकों की बड़ी भीड़ थी। बहुत से धनी- 4 व्यकित फल-फूल और मेवा मिठाइयों से भरे थाल लिये सरसमाधुरीशरण जी की पूजा के लिए घेरे खड़े थे। परे एक-दूसरे से पहले पूजा करने की होड़ लगी हुई थी। एक निर्धन व्यक्ति एक तश्तरी में कुछ फूल और चार वाशे लिये संकोचवश दूर खड़ा था। सरसमाधुरी शरणजी की उन पर दृष्टि पड़ी। उन्होंने सबको रोककर उसे निकट लाया, पूजा करवा बहुत-सा प्रसाद दिया। रूपमाधुरी जी को बहुत दिनों से तिजारी बुखार आ रहा था। बहुत इलाज करने पर भी ठीक नहीँ हो पा रहा वे उस समय जयपुर में ही रहते थे। उनके प्राण सदा सरसमाधुरीशरणजी की सेवा में रहते थे। इतने दिनों से उनकी वा से वंचित रहने के कारण वे बहुत दुखी थे। एक दिन उन्हें लगा कि कोई उनसे कान में कह रहा है“ गुरुदेव हा चरणामृत लो, ठीक हो जाओगे, उन्होंने किसी आदमी को सरसमाधुरीशरण जी का चरणामृत लेने सरस-कुञ्ज भेजा। इस दिन सरसकुङ्ञ में कोई उत्सव था। लोगों की बहुत भीड़ थी। सरसमाधुरीशरणजी तक उस आदमी के लिए पहुँचना परिकल था। वह नीचे की मंजिल में खड़ा सोचता रहा ऊपर जाऊँ या नहीं। जाऊँ तो लोगों की भीड़ चीरते हुए कैसे उनके निकट पहुँचूँ और कैसे उत्सव के बीच उनका चरणामृत्त लूँ। पर सरस माधुरी शरण जी ने सब कुछ पहले ही लिया था। वे अपने प्रिय शिष्य को अपना चरणामृत भेजने के लिए उस आदमी की प्रतीक्षा कर रहे थे। वे बाहर आये और नीचे झाँककर उससे ऊपर आकर चरणामृत ले जाने को कहा। आदमी ने चरणामृत ले जाकर रूपमाधुरी जी को दिया। उसका पान करते ही वे स्वस्थ हो गये। रूपमाधुरीजी से संबंधित उपरोक्त घटना से सरेसमाधुरी शरणजी के इस समय के आध्यात्मिक स्तर और उनकी दिव्य दृष्टि का कुछ आभास मिलता है। इसी प्रकार की एक और घटना इसकी पुष्टि होती है। एक बार सरस माधुरीशरणजी किसी उत्सव में पंगत के बीच प्रसाद पाने को बैठे, अपनी पत्तल के बगल में एक और पत्ल रखी और किसी के बैठने हेतु जगह छोड़ दी। प्रसाद परसा जाने लगा। किसी ने कहा-यह पत्तल खाली पड़ी है, इसे उठा लाओ। सरस माधुरी जी ने कहा--'“नहीं; यह पत्तल जिनके लिए है, वे अभी आ रहे हैं।”' थोड़ी देर में आये एक सिद्ध महापुरुष श्री अर्जुनदासजी। श्री सरसमाधुरीशरणजी के आध्यात्मिक स्तर की पुष्टि उनके दैन्य और क्षमाशीलता आदि गुणों से भी होती है। जो उनके चरित्र के दिव्य भूषणों के रूप में स्वाभाविक रूप से उनमें विराजमान रहते हैं। दैन्य की सरसमाधुरीशरणजी जैसे साक्षात मूर्ति ही थे। एक बार वृन्दावनमें किसी अवसर पर सिद्ध माधवदासजी समेत सभी संप्रदायों के महात्मा एकत्र थे। पारस्परिक ' प्रेम और सौहार्द के वातावरण में सब अपने-अपने सम्प्रदाय का उत्कर्ष सिद्ध करने में लगे थे। श्रीसरसमाधुरीशरणजी ' से संतों ने कहा--“' आप चुपचाप बैठे हैं। आप भी कुछ कहें न अपने सम्प्रदाय के संबंध में”। उन्होंने उत्तर दिया- “'हम तो आप सब लोगों के चरण-दासी हैं। इससे अधिक और क्या कहें? इससे सब लोग बहुत प्रभावित हुए। कुछ बाद श्री माधवदास जी ने ' भक्तसहरत्रनाम माल' की रचना की। उसमें श्री सरसमाधुरीशरणजी को माला का सुमेरु कहा। इस प्रकार आध्यात्मिक दृष्टि से जो अपने विद्वेषय से भी प्रेम करता है, उनके प्रति क्षमाशील रहता हू, महान है न कि वह जो अपने बल बुद्ध का प्रयोग कर उन्हें नीचा दिखाने की चेष्टा करता है। सरसमाधुरी त अपने विद्वेषय के प्रति भी क्षमाशील रहते। एक चरणदासी सन्त ने, जो उनसे ईप्या करता, उन्हें चरित्रहीन सिद्ध के लिए बहुत ही झूठी बातें एक पुस्तिका के रूप मे छपवाकर उसका वितरण किया। झूठ का पर्दाफाश होते ही सिर नीचा हुआ। बह क्षमा माँगने आया तो उसे देखते ही उन्होंने दौड़कर उसे गले से लगा लिया। कभी-कभी ऐसा होता है संत अपने विद्वेषी को भले ही क्षमा कर दे, प्रभु उसे क्षमा नहीँ करते। एक बार एक और व्यक्ति ने के सम्बन्ध में कुछ अनर्गल बातें छपवा दी । सरसमाधुरीशरणजी ने उसे क्षमा कर दिया। पर प्रभु ने क्षमा नहीँ कुछ ही दिन बाद उसका अपनी माँ से कलह हुआ। माँ ने उस पर तेजाब छिड्कर उसे अंधा कर दिया। जी किसी दुष्ट प्रकृति के व्यवित को दुष्ट कभी न कहते। समाज में उसके गुणों की ही प्रशंसा करते। उनके मृदु प्रेमपूर्ण व्यवहार से उसकी दुष्टता जाती रहती। एक दुष्ट व्यित उनके नाम से बाजार से. सौदा खरीद लाया वे उससे कुछ न कहते। दुकानदार का भुगतान कर दिया करते। कुछ दिन बाद उसे पता चल गया कि वे जानते 'भी उससे कुछ नहीँ कहते, तो वह बड़ा लज्जित हुआ। उसने उनसे क्षमा साँगी और फिर कभी ऐसा नहीँ किया। श्री बलदेवदासजी का गुरुद्वारा लुकसर में था। वे अकसर वहाँ जाया करते। उस समय वहाँ साधु-सन्तों का होता। श्री बलदेवदास जी भागवत की कथा कहते और संतों की भौति-भाति से सेवा करते। कथा-कीर्तन, और प्रेमानन्दके उस वातावरण से आकृष्ट हो दूर-दूर से संत गुरुवार में आकर महोत्सव में योगदान करते। एक ऐसे अवसर पर बलदेवदासजी ने सरसमाधुरीशरण जी को भी लुकसर बुला लिया, कुछ दिन वहाँ उन्हें अपने रखा औ संतों से परिचय कराया। कई बार उन्हें अपने साथ दिल्‍ली ले गये। वहाँ सिद्ध संत श्री मनमोहनदास जी दर्शन कराये। मनमोहनदासजी निरन्तर अष्टयाम लीला चिन्तन में डूबे रहते। उन्होंने अपने लीलानुभावोंके आधार पए लिखी अपनी हस्तलिखित वाणी उन्हें प्रदान की। उसे प्राप्त कर सरसमाधुरी शरणजी निहाल हो ग॒ये। श्री बलदेवदासजी ने भी उन्हें अपनी खड़ाऊँ के साथ अपने गुरुदेव की खड़ाऊँ और श्री शुक सम्प्रदायमें परम्परा से अर्चित शालग्राम कौ मूर्ति प्रदान की। अपने सेवित राधाकृष्ण के विग्रह वे उन्हें पहले ही दे चुके थे। इस प्रकार सारी संपत्ति अपने योग्यतम शिष्य को सौपकर वे निश्चित हो गये। श्री सरसमाधुरीशरणजी गुरुदेव की आहा प्राप्त कर जयपुर लौट गये। पर वे दिल्ली जाकर मनमोहनदासजी का संग प्राय: किया करते। उन्हीं से उन्‍होंने रसरीति के बारेमें बहुत कछु सीखा। वे जब जयपुर लौट गये तब बलदेवदासजी ने स्वण में उन्हें दर्शन देकर कहा-“' अब हम परमधाम को जा रहे हैं। तुम आनन्द से रहना। हरिभक्ति करना और कराना- कहि अब परमधाम हम जावैं। सत्य वचन हम तुप्हें सुनावै आनन्द मंगल मे नित रहियो। हरिगुरु भव्ति टेक दूढ़ गहियो। (रामरूप जी के जी० च में, 54) इतना कह वे अंतर्धान हो गये। स्वप्न भंग हो गया। सरसमाधुरीशरण जी चिंता में डूब गये। तीसरे दिन गुद से पत्र दवारा सूचना आई कि सम्बत्‌ 1958 आषाढ़ सुदी नवमी को गुरुदेव निजधाम पधार गये। [ श्री सरसमाधुरीशरणजी उसी दिन लुकसर गये और संप्रदाय की रीति के अनुसार एक बहुत बड़ा उत्सव किया श नन्दरामदासजी को लुकसर की गद्दी का महन्त बनाया फिर गुरुदेव के विरह से जर्जरित हृदय के साथ जयपुर लौट आये। पर गुरुदेव निजधाम पधारने के बाद भी क्या शिष्य से अलग होते हैं, विशेष रूपसे ऐसे शिष्य से जो पूर्णरूप से उन्‍हें समर्पित हो? वे उसके बाहर-भीतर सदा बने रहते हैं, उसकी पल-पल की खबर रखते हैं और उसके सारे