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श्री शुक सम्प्रदाय • वर्तमान पीठाधीश्वर
श्री स्वामी श्री अलबेली माधुरी शरण जी महाराज
Shri Swami Albeli Madhuri Sharan Ji Maharaj
प्राकट्य: जेठ अमावस्या सं० २००० वि०
निवास / पावन स्थल: श्री सरस निकुंज, जयपुर
पावन चरित्र एवं जीवन दर्शन
श्री शुक सम्प्रदाय, श्री सरस निकुंज पीठ, जयपुर के वर्तमान आचार्य एवं पीठाधीश्वर।
अनन्त श्री विभूषित श्री अलबेली माधुरी शरण जी महाराज
श्री शुक सम्प्रदाय आचार्य पीठ श्री सरस निकुंज की आचार्य पीठ पर श्री रसिक माधुरी शरण जी महाराज नहीं चाहते थे, कोई साधारण व्यक्ति बैठे। बड़े गुरु भाई लौकिक मर्यादा कायम रखते हुए पहले भाई बन्धुओं में से किसी को बैठना चाहते थे। उनका प्रयास विफल रहा फिर श्री शुक सम्प्रदाय आश्रित किसी व्यक्ति को बैठाने की बात चली। शिक्षा-दीक्षा की, भजन शैली की वार्ता चली। लेकिन इसमें भी सफलता नही मिली। श्री रसिक माधुरी शरण जी महाराज विक्रम संवत् 1999 से काफी पूर्व से ही जान रहे थे कि इस आचार्य पीठ पर कौन आएगा विशेष बात यह है कि इस संदर्भ में जब अनन्त श्री विभूषित श्री सरस माधुरी शरण जी महाराज के पौत्र (अनन्त श्री विभूषित श्री रसिक माधुरी शरण जी महाराज के पुत्र) का धाम गमन हो गया, तब किसी के शोक प्रकट करते हुए वंश परम्परा के सम्बन्ध में चिन्ता व्यक्त करने पर उन्होंने कहा- "हमारे वंश की परम्परा तो श्री शुकदेव जी महाराज से है, जो सदा चलती रहेगी।" और श्री शुकदेव जी महाराज से प्रार्थना की। विक्रम संवत् 1999 ज्येष्ठ बुदी अमावस्या को श्री अलबेली माधुरी शरण जी महाराज का जन्म हुआ । जन्म का नाम श्री नरेन्द्र कुमार रहा। समय आने पर आप श्री सरस निकुंज के गद्दी पर पधारे। मैं समझता हूँ कि उक्त बात इसलिए सही है कि श्री नरेन्द्र कुमार जी की लौकिक प्रतिक्रिया के आधार पर श्री सरस निकुंज आचार्यपीठ पर संभव नहीं था। कारण, आप परिवार में पहले पुत्र थे और पहले पुत्र को गोद नहीं दिया जाता। आप अपने दादाजी के तो अत्यन्त लाडले थे ही, बड़े और पहले होने के नाते सभी के लाडले थे। लेकिन ठाकुर की रचना को कौन मिटा सकता है? सारे संघर्ष के बाद आप ही सरस निकुंज आचार्य पीठ पर पधारे विशेष बात आपकी दीक्षा श्री रसिक माधुरी शरण जी महाराज द्वारा बसंत पंचमी (दिनांक 16-2-1956 वि. सं.2012) के दिन हुई और उसी समय से आपको श्री ठाकुर सेवा मिल गई जो आज तक चल रही है। बसंत पंचमी (दि. 12-2-1959 वि.सं. 2015) के दिन ही आप गद्दी पर बिराजे। बसंत पंचमी का दिन मौसम के हिसाब से प्रथम श्रेष्ठ, ठाकुर की लीलाओं के हिसाब से प्रथम श्रेष्ठ है। बसंत से ही वर्षोत्सव चालू होते हैं। श्री शुक सम्प्रदाय का बसंत पंचमी का उत्सव अपने आप में विशेष महत्त्व रखता है चूंकि आचार्य महाप्रभु श्री श्यामचरणदास जी महाराज ने बसंत पंचमी का ही उत्सव मनाना शुरु किया है। जो आज भी श्री श्यामचरणदास जी महाराज के आश्रम दिल्ली में बड़ी धूम-धाम से मनाया जाता है। संत-महंत पधारते हैं, समाज होता है, रंगत-पंगत होती है। अन्य स्थानों पर भी मनाया जाता है। बसंत पर खिले फूल बड़े ही सुन्दर और खुशबूदार होते हैं।
श्री शुक सम्प्रदाय का बसंत पंचमी को खिला फूल क्यों नहीं पूर्ण सुगन्धित होगा। इस फूल की खुशबू जिसको मिले वहीं जानता हैं। वैसे कमोवेश सभी जानते हैं। आज श्री शुक सम्प्रदाय में जो चमक देखने को मिलती है वो श्री अलबेली माधुरी शरण जी महाराज हैं। क्यों नहीं हो, श्री रणछोड़ जी के और बड़े आचार्यों के आशीर्वाद स्वरुप वचन पहले ही मिल चुके ।
सिष शाखा होगी सरस, द्वारे श्री बलदेव । फैलेगी प्रेमा, परा, भक्ति और हरि सेव ।।
आज शुक सम्प्रदाय के बड़े-बड़े महन्त तो कहते ही है कि हमारे स्थान की व्यवस्था श्री अलबेली माधुरी शरण जी महाराज देख ले, अन्य सम्प्रदाय के संत महन्त भी श्री अलबेली माधुरी शरण जी महाराज का सानिध्य पसंद करते हैं। एक खास बात यह है कि आप अपनी पहली दीक्षा के बाद से सुबह सेवा में पधारते फिर विद्या अध्ययन को जाते। अध्ययन पूर्ण कर सुबह सेवा कर अग्रवाल हायर सैकण्डरी स्कूल में अध्यापन के लिए जाते व अपना खर्च उसी वेतन से चलाते। स्कूल से आकर प्रसाद पाते, कुछ देर आराम करते तो करते नहीं उत्सव में चले जाते । संध्या की सेवा में आ जाते और अब पूरे समय सेवा व उत्सवों को ही समर्पित है, गृहस्थ तो नाममात्र का है।
जैसे श्री रसिक माधुरी शरण जी महाराज को पहचानना मुश्किल है वैसे ही श्री अलबेली माधुरी शरण जी महाराज को पहचानना अधिक मुश्किल है। यदि कुछ पहचान जाए या पहचानने की कोशिश करे तो आप मुस्करा कर, फूल बरसा कर, माला फेंक कर या थोड़ा सा क्रोध दिखाकर भूला देते हैं। आप द्वारा वैष्णव जन पर की गई कृपाओं का अथाह भण्डार है। कईयों को मरने से बचा लिया, कईयों की बीमारी ठीक कर दी, किसी को डिग्री दिला दी। ऐसे सभी की पूर्ति कर रहे हैं।
एक कहते है मुझे जब भी माला मिलती है मेरी एक भागवत फिक्स हो जाती है। एक कहते है मुझे माला मिली जिसकी खुशबू करीब चार दिन तक यथावत रहीं और मुझे पी.एच.डी. की डिग्री मिल गई। एक कहते हैं कि मुझे अचानक चरणोदक दिया, वह कुछ समय बाद मेरे पति के हार्टअटेक आने पर काम आया और वह ठीक हो गए। एक कहते हैं मुझे आशीर्वाद दिया और मुझे मजिस्टेट की नौकरी मिल गई। मैं खुद कहता हूँ कि मुझे वृन्दावन जाने का ऐसा आशीर्वाद मिला कि मेरे बच्चे की तबीयत ठीक हो गई । ऐसी अनेक लीलाएँ हैं। समय आने पर इन्हें विस्तार से लिखने का प्रयास करेंगे ।
एक विशेष बात यह भी है कि इस सम्प्रदाय के मूल आचार्य महामुनीन्द्र श्री शुकदेव जी महाराज है, उनकी कृपा से ही व उनके हाथ में ही सम्प्रदाय की बागडौर हैं। उनकी, इन पर अलौकिक कृपा हैं। यह मैं नहीं कह रहा हूँ। यह बात आज से 35-40 वर्ष पहले श्री उत्तमचन्द जी नागल्या ने जो कि अनन्त श्री विभूषित श्री सरस माधुरी शरण जी महाराज के विशेष कृपा पात्र है। उन्होंने कही हैं और करीब साल भर पहले मलूक पीठाधीश्वर माहंत श्री राजेन्द्र दास जी ने कहा, इन पर श्री शुकदेव जी महाराज की कृपा हैं, इनको कैसी बीमारी हैं।
कहने का भाव है, ये सब निकुंज सखी सहचरी है, जगत उद्धार हेतु
समय-समय पर भूतल पर पधारती हैं:-
आचारज भूतल विषे, कुंज सहचरी रूप । लखे रूप की एकता, भावहि मांहि अनूप ।।
(श्री शुक स. सि. चन्द्रिका )
॥ दोहा ॥
वय किशोर लावन्य निधि, वसन चम्पई रंग।
सेवा स्तवगान की, प्रेम पुलक अँग अँग ॥१॥
लालमाणिन सों जगमगत, कुंज मंगला ऐन ।
अतुलित रचना हैं तहां, कहत बनत नहिं बैन ॥२॥
अग्र मंगला कुँञ्ज के, सुन्दर वर दालान ।
वीन लियें कर शुकसखी, करन लगी कलगान ॥३॥
श्यामचरणदासी सखी, लै परिकर निज संग ।
सेवासोंज ले कर खड़ी, हियमें हर्ष उमंग ॥४॥
अरुण चम्पई वस्रवर, नख शिख सजि श्रृंगार ।
रस आचारज यूथ पति, शोभित कुंज अगार ॥५॥
