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श्री स्वामी श्री रामरूपजी महाराज
श्री शुक सम्प्रदाय • द्वितीय आचार्य

श्री स्वामी श्री रामरूपजी महाराज

Shri Swami Ramroop Ji Maharaj

प्राकट्य: सं० १८०१ वि०
धाम गमन: ज्येष्ठ सुदी द्वादशी, १८४७ वि०, बुधवार (स्थान- बेरी ग्राम)
निवास / पावन स्थल: मुहल्ला जैसिंहपुरा, देहली

पावन चरित्र एवं जीवन दर्शन

३-श्री स्वामी रामरूप जी महाराज अनादिकाल से अनवरत् चली आ रही परम्परा में असंख्य आचार्य, संत-भक्त इस धराधाम पर प्रकट होते रहे हैं। उनके भूतल पर अवतरण का हेतु त्रिताप दग्ध जीव-मात्र को भगवद् भजन-संबल प्रदान कर श्रीहरि की प्राप्ति कराना ही है। इस परम्परा में ही वैष्णव धर्म के प्रचारार्थ श्री स्वामी रामरूपजी महाराज का आविर्भाव हुआ। आप श्री आचार्य महाप्रभु श्रीश्यामचरणदासजी महाराज के प्रधान शिष्य और उनकी परम्परा में प्रधान आचार्य हुए। आपका जन्म वि०सं० १८०१ में गौड़ ब्राह्मण वंश में दिल्ली के पास जैसिंहपुरा नामक गाँव में हुआ। आपके पिताजी का नाम श्री महाराम जी था। रामरूप जी के जन्म के तीन महीने बाद ही आपकी माता परमपद को प्राप्त हो गई। तब पिता श्रीमहाराम जी ने धाय माता को बुलाकर आपको उन्हें पालन-पोषण के लिये सौंप दिया। बालक को धाय को सौंपकर पिताजी पूर्व दिशा में आजीविका हेतु चले गये। पिता गये पूरब दिशा, करन नौकरी आप। घोड़े पर जु सवार हो, अतुलित तेज प्रताप ॥ कुछ समय तक वे धाय के पास खर्च भेजते रहे फिर वे भी परमपद को प्राप्त हो गये। धाय के कोई और संतान नहीं थी, इसलिये उसने इनको अपना ही पुत्र समझकर बड़े प्यार-दुलार से लालन-पालन किया। धीरे-धीरे आपकी आयु दस वर्ष की हो गई। तब दैवगति से आपका पालन करनेवाले धाऊ-धाय भी गोलोक पधार गये। भये वर्ष दश के जब प्यारे । धाउ धाय हू स्वर्ग सिधारे ॥ रहे अकेले बालक जबही। संस्कार शुभ जागे तब ही ॥ (लीलासागर, २१८) अब बालक अकेला रह गया। पर सच्चा आश्रय भी अब ही मिलने वाला था। बालक के मन में यह बात आई कि मैं दिन-रात हरि के चरणकमलों का ध्यान करूँ। श्रीहरि का मन लगाकर भजन करूँ जिससे मेरा जगत-जाल में चित्त ही न लगे। इधर आचार्य महाप्रभु श्री श्यामचरणदासजी महाराज भी आपके रूप में योग्य शिष्य की ही प्रतीक्षा में थे। भगवद् प्रेरणा से श्री रामरूपजी दिल्ली आ गये। वे पहुँचे श्री महाराज चरणदास जी के पास। साष्टांग दण्डवत कर उनके चरणों में गिर गये और हाथ जोड़कर स्वयं को अपनाने की प्रार्थना की। श्रीआचार्य चरण ने आपकी स्थिति देखकर तुरन्त स्वीकार कर लिया। कंठी बाँधी, मस्तक पर तिलक लगाया और गुरुमंत्र सुना दिया। अब आप पूरे वैष्णव हो गये। गुरुदेव आपसे बहुत हित करते थे और ये भी हर समय गुरुदेव की सेवा में उनके पास लगे रहते। आप सेवा में बड़े कुशल थे। आप गुरुदेव को साक्षात् ईश्वर रूप समझकर आनन्द से सेवा करते। श्री गुरु सेवा में इन्हें बड़ा आनन्द मिलता इसलिये गुरुदेव ने प्रसन्न होकर आपका नाम 'गुरु भक्तानंद' रख दिया। श्री गुरुदेव के पास रहकर आपने उनकी कृपा से सब विद्या, भजन की रीति, योग-साधना, ज्ञान-ध्यान, नवधा भक्ति, प्रेमा-परा भक्ति आदि सब अल्प समय में ही ग्रहण कर लिया। आपकी कुशाग्र बुद्धि और कार्य कौशल को देखकर श्री महाराज ने आपको 'स्वामी' की पदवी से विभूषित कर दिया और आपको अपना दीवान बना लिया। गुरूदेव ने आपको पुस्तकालय में ग्रन्थ शोधन की सेवा सौंप दी। शोधन सेवा दीन। श्री गुरु परम प्रवीन ॥ पुस्तकालय ग्रंथ की, चतुर शिरोमणि जानि के, (लीलासागर, २१९) श्री गुरुदेव ने अपनी कृपा शक्ति से योग, ज्ञान और भक्ति की संपूर्ण साधनाओं में पूर्ण करके आपको 'ब्रह्मरूप' ही बना दिया और अब आपका नाम 'रामरूप' रख दिया। श्री गुरु चरणहिदास, किरपा करी महान। स्वामी रामहि रूप इन, कियो नाम शुभ दान ॥ 29 (लीलासागर, २१९) अब आपका मन प्रेम रंग में रंग गया। आप पूरी तरह से प्रेम दीवाने हो गये। प्रभु से प्रेमपूर्वक प्रार्थना करते। हे प्रभु! आप तो सर्वेश्वर हो। आप अपने जन की सदा संभाल रखते हो। ऐसी प्रभु तुमही सूँ बनि आवै। झूठे ही शरण गहे जो तेरी, बेगहि कष्ट मिटावै ॥ नीचन कूं ऊँचो पद दिनो, तिरलोकी यश गावै । जब जब भीर परत संतन पर, सरगुण तनधर धावै ॥ जनके अवगुण देखत नाहीं, गुनही कूँ हिय लावै । लेत संभार गिरन नहीं देवे, बहुत भाँति अपनावै ॥ कर गहि तारै बेग उबारै, विपदा सकल छुटावै। रामरूप चरणदासा करके, भवजल पार लगावै ॥ (मुक्तिमार्ग) अब तो हरि से नेह इस प्रकार का लग गया कि देह-सुधि भी विस्मृत होने लगी। प्रेम दीवाने श्रीरामरूप जी के हृदय में अब विरह व्यथा छा गई। कृष्ण दरस हित हिय अकुलावै। सुबकी लै दृग नीर बहावैं ॥ हाय-हाय हरि ले सुधि मेरी। दर्शन की मोहि चाह घनेरी ॥ ज्यों चकोर चंदा हित तरसे। दुखी पतंग दीप बिन दरसे ॥ श्री सद्गुरु ने इनके हृदय में जिसकी लगन लगा दी थी अब वे विरहजनित स्वर से उससे दीदार कराने की विनती करने लगे। दया कर दीजै हो दीदार। बिन देखे चित चैन नहीं है, बेग महर जब कीजै हो । याद तुम्हारी हिया जरावै, दुख दूना तन छीजै हो। नजर निहारूँ डगर पियारे, कब वह छवि लखि जीजै हो । रामरूप है व्याकुल विरहन, लाल अरज सुन लीजै हो । (मुक्तिमार्ग, विरह का अंग) श्री गुरुदेव ने इनकी ऐसी स्थिति देखकर श्रीभगवान् के दर्शन कराये। क्या मनोहर माधुरी छवि है? दर्शन पाकर एकदम खिल गये। जिसके विरह में हृदय फट रहा था, कब से जिसे पुकार रहा था, उसने महर कर हमारी सुधि तो ली ही, साथ ही साथ सारी तपन मिटाकर दर्शन का भारी सुख बख्शाया है। श्री रामरूप जी पूर्ण परमानन्द में मग्न होकर अब प्रेम से गा उठे- हुई घर आशिकाँ शादी सनम का लख नजारा है। कमल दल खिल गये सारे नजर आई बहारा है॥ कभी की इन्तजारी थी बिरह की पुर खुमारी थी। निहायत बेकरारी थी दयाकर गम निवारा है। दरश का सुख हुआ भारी, तपन जो मिट गई सारी। किया जब सर्व बलिहारी, दुई दुःख दूर डारा है। दिया मुरशिद ने जो यह सुख, कहीं ढूँढ़ा न पाया दुःख। लखा महबूब को सन्मुख, हुये आनन्द अपारा है। नसी कुल्फत जिगर दूरा, बसी उल्फत किये पूरा। समाया नूर में नूरा, सोई रामरूप प्यारा है। (श्री मुक्तिमार्ग) स्वामी रामरूपजी महाराज को श्री गुरुदेव ने अपने ही समान अलौकिक शक्ति सम्पन्न बना लिया। उन्हें पूर्णता में पहुँचाकर तारण तरण बना दिया। उस गुरु शक्ति के अनुभव का उल्लास आप में पूर्णता से भर गया। वह दिव्य गुरु शक्ति ही तो है जो ईश्वर रचित माया-भोगादि से हमें अलग करता है, उन्होंने गुरु महिमा का यह पद गाया है- मोको गोविन्द सों गुरु प्यारो। गोविन्द ने गुन संगी कीनों, गुरु ने कीनो न्यारो ॥ गोविन्द लोक-भोग विष दीये, अरु परलोक बिगारो। विषयी बंधन काटे सारे, गुरु परलोक संवारी ॥ गोविन्द अर्थ काम मोहि दीने, भवसागर में डारो। अर्थ काम गुरु मोहि छुटायो, भवसागर ते तारो ॥ चरणदास गुरु देव दया करि, दियो अभय पद भारो। 'रामरूप' आनन्द ही पाये, बार-बार बलिहारो ॥ (श्री मुक्तिमार्ग, २०९) आचार्य महाप्रभु श्री श्यामचरणदास जी महाराज ने इनमें जीवों को तारने की योग्यता देखकर रामत करने की आज्ञा दी जिससे संसार के लोग आपकी शरणागत होकर अभय हों और भगवद्धाम के अधिकारी हों। श्री गुरुदेव की आज्ञा से आपने रामत शुरू की- गुरु आज्ञा से रामत कीनों। भक्तिदान जीवन जग दीनों ॥ देश-विदेश रमे ले संता। शिष सेवक जग किये अनंता ॥ आपके ८२ गुणी महन्त प्रमुख शिष्य थे जिन्होंने अलग-अलग स्थानों पर अपने आश्रम स्थापित किये और भी हजारों साधु आपके शिष्य थे। इस प्रकार शिष्य शाखा का विस्तार करके आपने भगवद्भक्ति का खूब प्रचार किया। रामत करते हुए ही उन्होंने अद्भुत प्रेम रस से सराबोर करनेवाली तथा रसिक संतों-भक्तों के मन को भाने वाली वाणी लिखी। आपके मुख्य दो ग्रंथ हैं- 'श्रीगुरुभक्ति प्रकाश' जिसके नाम से ही स्पष्ट है कि गुरु भक्ति, गुरु-सेवा के बिना हृदय में उस प्रकाश का प्राकट्य नहीं होता जो भगवद्दर्शन के लिये आवश्यक ही नहीं अनिवार्य है। इसमें उन्होंने अपने गुरुदेव श्री आचार्य महाप्रभु श्यामचरणदासजी का जीवन-चरित लिखा है। दूसरा प्रधान ग्रंथ है- 'मुक्तिमार्ग'। इसके भी नाम से स्वाभाविक ही जाना जा सकता है कि इस ग्रंथ में उन्होंने मुक्ति पाने के मार्ग का निदर्शन सरल रूप में किया है जिसे पाना परम पुरुषार्थ माना गया है। ये दोनों वाणियाँ बड़ी अद्भुत हैं। श्रोता-वक्ता के मन को हरनेवाली और ज्ञान, वैराग्य सहित भक्ति उत्पन्न करनेवाली है। लीलासागर में श्री रामरूप जी के बड़े गुरू भाई ध्यानेश्वर श्री जोगजीत जी ने लिखा है कि आपकी वाणी श्रीमहाप्रभुजी के सब शिष्यों की वाणियों में सबसे सुन्दर और सरस है- शिष्य श्री महाराज के, रचना बानी कीन। उन सबसे सुन्दर सरस, स्वामी जी कथ दीन ॥ इसके अलावा आपके द्वारा रचित जैमिनी अश्वमेघ पर्व (महाभारत) श्री शुक जन्म लीला, आमिष निवारण और प्रतिपदा (पड़वा) माहात्म्य आदि रचनाएँ भी प्राप्त हैं। एक बार रामत करते हुए ही श्री शुकदेव जी महाराज ने इनको स्वप्न में दर्शन दिए और पास में स्थित पर्वत की गुफा में स्वयं (श्री शुकदेव जी) की मूर्ति हाने की बात कही और उस विग्रह को दिल्ली ले जाकर विधिसहित मंदिर में पधराने व पूजा करने की आज्ञा दी। स्वामी रामरूप जी प्रातः उठकर संतों को साथ लेकर पर्वत की उस गुफा में गये जहाँ श्री शुकदेव जी महाराज की बहुत सुन्दर मूर्ति थी। सभी ने दण्डवत करी और भगवान् शुकदेव जी की जय-जयकार करते हुए उस विग्रह को सिंहासन पर पधराकर दिल्ली ले आये और विधि विधान से प्रतिष्ठा करवाकर पूजा-अर्चना शुरू कर दी। आज भी यह श्री विग्रह मंदिर में विराजमान है। स्वामी रामरूप जी को एक बार खाकी-नागा संतों की जमात मिल गयी। खाकी-महन्त ने उनसे परम्परा, उपासना, मुक्ति तीर्थ, धर्म, व्रत आदि के सम्बन्ध में प्रश्न किये तब आपने उनकी जिज्ञासा का समाधान करते हुए श्री शुक सम्प्रदाय के सिद्धांत से उन्हें अवगत कराया। महज दो छप्पै में उन्होंने सम्प्रदाय के समस्त सिद्धांत को संक्षेप में स्पष्ट कर दिया है- राधाकृष्ण उपास्य धर्म भागवत हमारो। निज वृन्दावन धाम, मुक्ति सामीप्य निहारो ॥ तीरथ गंगा जान, व्रत ग्यारस को धारो। क्षमा शील संतोष दया नित हिये विचारो ॥ सम्प्रदाय शुकदेव मुनि आचार्य श्यामचरन दास । रामरूप तिन पद शरण नवधा भक्ति निवास ॥ जै जै श्री शुकदेव सम्प्रदा तासु कहाई। भगवत धर्म बखान जगत में भक्ति चलाई ॥ चरणदास किये शिष्य, सर्व गति ईश आचारज । भये अभय बहु जीव सर्व के सारे कारज ॥ सम्प्रदाय यह पाँचवीं द्वारे है बहुत भाँति ही। रामरूप लागौ शरण, जब मन आई शांति ही ॥ (मुक्तिमार्ग, २०-२१) श्री गुरु प्राप्ति के बाद भजन की क्रिया प्रारम्भ होती है। भजन की भी कई विधियाँ हैं किन्तु कलियुग में विविध समस्याओं से ग्रसित जीवों के लिए हरिनाम स्मरण ही सर्वश्रेष्ठ साधन है, जिसका स्वामी रामरूप जी महाराज ने बहुत जोर देकर वर्णन किया है। नाममहिमा में उनका मत है- थोथे सबही नाम बिन, योग यज्ञ धन धाम । रामरूप राजा वही, जा घट नौबत नाम ॥ सुमिरन सम दौलत नहीं, रामरूप कलि माँहिं। तन मन से भजिये सदा, तीनों ताप नसाहिं ॥ सुमिरन सौदा खूब है, मुक्ति नफा ता माहिं। रामरूप कोई करो, टोटा आवै नाहिं ॥ (मुक्तिमार्ग) लेकिन इसके लिये भी कमर कसनी पड़ती है। दृढ़ निश्चय करके शूरवीरता से मैदान में डटना पड़ता है और शूरवीर वही है जो भर्म रूपी कपाट को तोड़कर, संसार से सहायता की आशा छोड़कर भक्ति-मैदान में डटकर स्मरण में लगा रहता है। रामरूप सोई सूरमा, तोड़े भर्म कपाट । सुमिरन में लागा रहै, छाँड़ि जगत की बाट ॥ कायर लोग तो परिवार आदि की बेड़ियों को भी नहीं तोड़ पाते हैं और उन्हें ही ये माया बाँधती है- कायर कुल में फँस रहे, अरु माया के जाल। रामरूप न्यारे हुये, सोई निहाल ॥ भये पूर्ण निष्ठा और समर्पण से ही बात बनती है। मुफ्त में कुछ नहीं मिलता है और मिलता है तो वह क्षणिक होता है और आनन्द देनेवाला नहीं होता। सर्वश्रेष्ठ वस्तु, परम आनन्द देने वाली वस्तु तो तन-मन-सर्वस्व समर्पण से ही प्राप्त होती है और जब हम बात परमात्मा की करते हैं तब तो यह अति अनिवार्य है। उन्होंने कहा है- हरि हीरा हमने लिया, तन मन अरपा शीश। सहज सुहैला ना मिले, रामरूप जगदीश ॥ इतनी सहजता से वह हरि नहीं मिलेगा। वह तो अनन्यभाव से उसके प्रति समर्पित होकर उसे ही चाहने से और तत्सम्बन्धी साधन करने से मिलेगा जो गुरुद्वारा प्रदत्त हो। स्वामी रामरूप जी के अनन्यता के बारे में स्वयं के ही वचन हैं- कितनी दृढ़ता और साहस के साथ वे कह रहे हैं- मैं तो एक निरंजन ध्याऊँगा। लाभ होय के सर्वस जाओ, और न शीश नवाऊँगा ॥ एक ही आश एक विश्वास, एक ही सूं लव लाऊँगा। एक ही साहिब सिरजनहारा, ताही के गुण गाऊँगा ॥ टेक गही साँचे साईं की, झूठा भर्म भगाऊँगा। धर्मराय की काण न मानूँ, ऐसा अदल बिठाऊँगा ॥ अमर नगर में जाय बिराजूँ, निर्भय बम्ब बजाऊँगा। रामरूप कहै सुनियो साधे, भवजल बहुरि न आऊँगा ॥ (श्री मुक्तिमार्ग, २२३) कितना प्रबल आत्मविश्वास है। इतनी अनन्यता हो तब साधक का काम बनता है। एक भगवान् की शरण ग्रहण किये बिना और एक भगवान् का ही भजन किये बिना इस जीव की गति नहीं, उसे बार-बार जन्म-मृत्यु के चक्कर में आना पड़ेगा। स्वामी श्री रामरूप जी ने अपने जीवन के २६ वें वर्ष में ही स्वयं का आगे का जीवन लिख दिया था। उन्होंने परमधाम जाने का माह, मिति, सम्वत और समय की सूचना करके अपने संत-महंतों को अपने वचनामृत से सदुपदेश देकर संतुष्ट किया। यह उनकी त्रिकालज्ञता का आदर्श रूप है। इसमें उन्होंने भविष्य का कथन किया था। उन्होंने जीवन के अंतिम समय में अपने साधु-संत शिष्यों को बुलाकर धाम यात्रा करने का निश्चय सुनाया। संतों ने पूछा- 'महाराज ! आप किस विधि से धाम गमन करेंगे। स्वामी रामरूप जी ने उत्तर दिया- मैं चाहूँ तो इस शरीर को हजार वर्ष तक रख सकता हूँ, मैं चाहूँ तो सशरीर धाम चला जाऊँ। परन्तु मैं योग विधि से युक्तिपूर्वक देह त्याग करूँगा। गुरुदेव की भी मुझे यही आज्ञा है।' 'आप प्रभु आज्ञा दई, रामरूप मान लई दशम द्वार प्राण तजों यही मो सुहात है।' (श्री मुक्तिमार्ग, ३११) श्री स्वामी रामरूप जी महाराज एक बार दिल्ली की गद्दी अपने शिष्य श्री सिद्धराम जी को सौंपकर बेरी ग्राम (हरियाणा) के लिये प्रस्थान किये। मार्ग में हरियाणा में ही एक गाँव पड़ता है- मेहराणा जहाँ श्री रामरूप जी एक रात संतों के संग रुके थे। गाँव के लोग उनके दर्शन और सत्संग से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने अपने गाँव में स्वामी जी का मंदिर बना दिया जो आज भी वर्तमान है। मेहराणा से चलकर वे बेरी ग्राम (जिला झज्झर, हरियाणा) पहुँचे। यहाँ कुछ समय तक रहकर लोगों को उपदेश किया। एक दिन उन्होंने अपने प्रिय शिष्य सिद्धराम जी को अपने पास बुलाकर, सिर पर हाथ रखकर कहा- 'अब हम धाम गमन करेंगे।' यह सम्वत् १८४७ जेठ सुदी बारस, बुधवार का दिन था जिसका संकेत रामरूप जी ने पहले ही सबको कर दिया था। किया। अठारह सौ अरु सैंतालीसा। सम्वत् विक्रम बिश्वेबीसा ॥ जेठ सुदी बारस तिथि जानी। बुद्धवार दिन लिया पिछानी ॥ स्वामी रामरूप जी ने प‌द्मासन में बैठकर दशम द्वार का भेदन करते हुए देह त्यागकर श्रीभगवद्लीला में प्रवेश छियालीस वर्ष भूतल रहे, भक्ति प्रचारी जगत में, परमारथ के काज ॥ रामरूप महाराज । बेरी गाँव में महाराज रामरूप जी की सुन्दर समाधि और बड़ा आश्रम है जहाँ महाप्रभु श्री श्यामचरण दास जी के समय से ही प्रचलित वसंत पंचमी का बड़ा मेला लगता है।