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श्री शुक सम्प्रदाय • तृतीय आचार्य
श्री स्वामी श्री रामकृपालदास जी महाराज
Shri Swami Ramkripal Das Ji Maharaj
निवास / पावन स्थल: ककरोई (दिल्ली)
पावन चरित्र एवं जीवन दर्शन
श्री रामकृपाल दास जी महाराज
इस प्रकार बहुत दिनों से हृदय में उत्पन्न उमंग आज साकार हो गई। जन्म-जन्मान्तर का वियोग एक क्षण में ही खत्म हो गया। प्यारे की अद्भुत दिव्य शोभा युक्त छवि का गुरु-कृपा से दर्शन कर श्री अजपादास जी उन पर न्योछावर हो गये।
स्वामी श्री रामरूप जी के 82 गद्दीधारी महन्त शिष्य थे। उन्हीं में थे श्री रामकृपालदासजी। श्री सिद्धरामजी (जो आचार्य गद्दी के महन्त थे) के बाद श्री रामकृपालदास जी सर्वाधिक सम्मानित महात्मा थे। दिल्ली के पास ही ककरोई नामक स्थान पड़ता है। श्री रामकृपाल दासजी वहीं निवास करते थे। ककरोई तथा आस-पास के गाँवों के निवासी आपकी सेवा करते व शिष्य भी हो गये। उन्होंने सभी को भगवद्भक्त बना दिया। सबकी दुविधा तथा दुर्मति जैसे विकारों को आपने दूर कर सनातन धर्म की रीति उनमें दृढ़ कर दी। अब बहुत से शिष्य प्रेमाभक्ति के सागर में मग्न होने लगे। इस तरह उन्होंने कलियुग को सत्ययुग में परिवर्तित कर दिया। उनकी श्री ठाकुर जी की सेवा में दत्तचित्त अवस्था थी। इसके साथ ही वे आस-पास के क्षेत्र में रामत करते हुए भी भक्ति के प्रचार में बराबर संलग्न रहे। श्री रामकृपालदासजी एक वचनसिद्ध महात्मा थे। उनकी महिमा संसार में छाई हुई है।
श्री रामकृपालदासजी ने 3-4 स्थानों का निर्माण करवाया था जिनमें एक स्वतंत्र स्थान लुकसर था जो हरियाणा के रोहतक जिले में पड़ता था। लुकसर की परम्परा आज भी वर्तमान है। इनकी वाणी बहुत ही आकर्षक एवं अत्यन्त मधुर थी। उन्होंने अपनी बानी में रामकृपाल, कृपा सखी आदि की छाप लगाकर पद रचना की है। उनके द्वारा रचित झूला का एक पद द्रष्टव्य है—
हिंडोरा भाई झूलत श्री राधे गोपाल।
नव जोवनि गुन रूप सुंदरी संग रंगीली बाल॥
तैसोहि बन कुसुमित प्रफुलित तैसेहि खग मृग व्याल।
तैसी घटा घुमड़ि मन छाई तैसी बनी बन माल॥
तैसेहि मंद सुगंध शीत युत पवन बहत तिहि काल।
तैसेहि मणि कंचन आभूषण तैसे बसन सब लाल॥
तैसोहि आनंद उमगि रहयो तैसो अद्भुत सबको हाल।
झूलि झुलाइ किये मन पूरन गावत ‘रामकृपाल’॥
हिंडोरा के समय की बड़ी अनोखी छवि है। सब कुछ प्रिया-प्रियतम मय है। जैसी प्रिया-प्रियतम की अद्भुत जोड़ी है वैसी ही सबमें दिव्यता झलक रही है। धाम की तो सब वस्तु दिव्य ही होती है। वहाँ सबका अस्तित्व श्रीराधाकृष्ण के निमित्त ही है। दो छोटे से पद और देख लें। प्रिय-प्रियतम व्यारू भोग के बाद अचवन कर रहे हैं—
अचवन करत जुगल सुख खान।
ले झारी शीतल जल जमुना लाई सखी सुजान॥
भर गिलास दीनों दम्पत्ति कर पीवत जीवन प्रान।
‘कृपा सखी’ दोऊ हाथ पुंछाले पट पोंछित हित मान॥
नवल वर अचवन करत सुहाये।
रतन जड़ित झारी कर राजत सरस सखिन मन भाये॥
गहत परस्पर होड़ा-होड़ी प्रेम प्रीत दरसाये।
‘रामकृपाल’ लाल गोरी मुख निरखि परम सुख पाये॥
उनके द्वारा रचित श्री राधा गोपाल की आरती भी बहुत भावपूर्ण है। आरतीकर्ता की प्रार्थना यही है कि दोनों श्यामा-श्याम उसके हृदय रूपी कुंज में अविचल राज करें।
आरती श्री राधा गोपाल की
गौर श्याम शोभा निधि दोऊ नवल लाडूली लाल की।
हिलमिल बैठे रतन सिंहासन सुन्दर रूप रसाल की॥
सब सुखखान बान करुणा की निज जन के प्रतिपाल की।
चित चौमुख मन तूल भाव घृत जोती प्रीति रसाल की॥
चार फेर तन मन सब दीजै लखि छवि नैन विशाल की।
अति आनंद सदा वृन्दावन गति नहिं माया जाल की॥
अविचल राज करहु हिय कुंजन जीवनि ‘रामकृपाल’ की॥
