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श्री स्वामी श्री जुगल बिहारीदास जी महाराज
श्री शुक सम्प्रदाय • चतुर्थ आचार्य

श्री स्वामी श्री जुगल बिहारीदास जी महाराज

Shri Swami Jugal Bihari Das Ji Maharaj

निवास / पावन स्थल: ककरोई / ब्रज प्रदेश

पावन चरित्र एवं जीवन दर्शन

श्री बिहारी दास जी महाराज जुगल विहार उपासना कुंज केलि आनंद। दिव्य दृष्टि देखें सदा मिलते परमानन्द॥ श्री बिहारी दास जी श्री रामकृपाल दास जी के कृपापात्र शिष्य थे। वे सबको सुख देने वाले, अहर्निश भजन में ही विलसित रहने वाले महात्मा थे। उनकी निकुंज की सखी भाव की युगलोपासना प्रसिद्ध है जो सम्प्रदाय का परमोत्कर्ष है। वे सदा आनन्द में मग्न रहने वाले और सबको दिव्य दृष्टि से देखने वाले थे। गुरु परम्परा से प्राप्त उत्तरदायित्व का उन्होंने सहर्ष निर्वहन कर सम्प्रदाय व धर्म प्रचार का व्यापक कार्य किया। उनकी ‘माघ माहात्म्य’ रचना बताई जाती है। इसके साथ ही उन्होंने प्रिया-प्रियतम के विहार से संबंधित कई पदों की रचना की है। इनकी वाणी भावुक हृदय के उद्गार हैं जो भक्ति भावना से पूरित हृदय को सरस बना देती है। उनके द्वारा रचित श्री लालजू की जन्म बधाई देखिये— आज अति ब्रजपति के आनन्द। रानि जसोमती कूख सिरानी, प्रगट्यो गोकुल चन्द॥ मंगलचारि शुभ गावति आवति ब्रजनारिन के वृन्द। विप्र सुनारिन असीस उचारें निरखत मुख आरविन्द॥ दान मान परितोषि जाचकनि भाट सुनावत छन्द। भादो कृष्ण अष्टमी के दिन प्रगटे आनन्द कन्द॥ जाको शिव सनकादिक चाहत चरन कमल मकरन्द। बिहारीदास गुरु कृपा निहार दूर गये दुख द्वन्द्व॥ एक पद में उन्होंने दम्पत्ति के शयन का वर्णन किया है। राग-सारंग जुगल निकुंज सेज दम्पति मिलि कीनो है आराम। सब परदा छिटकाय अलीगन करके द्वार परनाम॥ चलीं सखी सब निज निज कुंजन उर धरि श्यामा श्याम। बिहारिदास सखी कृपा विचारत निरखि केलि सुख धाम॥ श्री बिहारी दास जी की लुकसर (हरियाणा) और सरस कुंज, जयपुर में परम्परा चल रही है। स्वयं श्री बिहारीदासजी अधिकांशतः ककरोई में ही रहा करते थे।